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बलात्कार की व्यापकता…विचारने की जरूरत

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय
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जब से मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में लोगों के मरने की समस्या खत्म हुई है,मानव जनित एक नई समस्या ने आकर समाज को घेर लिया है। मानव द्वारा मानव का बलात्कार,उम्र और लिंग को नजरअंदाज करते हुए बलात्कार,निजी और सार्वजनिक स्थलों पर बलात्कार,दुधमुँहे बच्चों से लेकर मरणासन्न तक बलात्कार एवं समाज और कानून को धता बताकर बलात्कार। बलात्कार आज के समय में सबसे घृणित कुकृत्य है जिसका अंत अक्सर आत्महत्या होना है या पल-पल मरकर जीना है।
बलात्कार एक ऐसा कुकृत्य है,जो आत्महत्या की ही तरह एक बार में न होकर कई बार के प्रयास से परिपूर्ण होता है। बलात्कारी कई चरणों को पूरा करते हुए बलात्कार के उस चरण तक पहुँचता है जो अपराध या हंगामें की श्रेणी में आता है। किसी को टकटकी लगाकर देखना,पीछा करना,गलत इशारे करना,निजी अंग दिखाना,अश्लील शब्द बोलना,स्पर्श करना, बल प्रयोग करना और फिर बलात्कार करना। इसमें कई चरण तक तो हम छेड़खानी के अन्तर्गत रखते हैं और मामूली चर्चा के बाद नजरअंदाज कर देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि गंदी नज़र से देखना बलात्कार का प्रथम चरण है। एक बात यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि अलग-अलग चरणों में एक या कई अलग पीड़ित हो सकते हैं।
बलात्कारी और पीड़ित दोनों हमारे इसी समाज के सदस्य होते हैं। हमारे ही घरों के परिजन होते हैं। हमारी मानसिकता तय करती है कि अन्य के प्रति हम कैसी सोच रखते हैं। व्यापक और संकीर्ण मानसिकता की सीमा में हमारा स्थान हमारी सोच को स्थायी बनाता है और उसी सोच के अनुरूप हम कार्य करते हैं।
हमारे परिवेश,संस्कार,समाज और संस्कृति का हमारी आने वाली पीढ़ी पर सीधा असर पड़ता है। ह्यूगो ड ब्रिज के उत्परिवर्तन वाद ने यह साबित कर दिया है कि जीन पर तात्कालिक प्रभाव भी पड़ सकता है जो माता-पिता से इतर हो सकता है अर्थात् परिवेश जनित असर। रावण का दशमुख होना इसी प्रभाव का द्योतक था।
अब जरा ठहरकर हमें पूरी ईमानदारी से यह सोचना चाहिए कि जैसा समाज और भावी पीढ़ी हम चाहते हैं,क्या हम उसके अनुरूप अभिभावक हैं ? क्या हमारे द्वारा रखी गई बुनियाद हमारी अपेक्षा के अनुरूप है ? क्या हम अपने आपको एवं अपने समाज को परिष्कृत कर इस मुकाम पर रखे हैं,जहाँ से ऐच्छिक आगामी पीढ़ी का गठन हो सकेगा ? विचारिए।
नारी को उपभोग की वस्तु तथाकथित विकसित देशों ने ही बना रखा है। नारी को खूबसूरत गुड़िया बनाकर बाजार विकसित किए गए हैं। विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता,ब्रह्मांड सुन्दरी प्रतियोगिता से महाविद्यालयों एवं कस्बों में भी सुन्दरी प्रतियोगिता का आयोजन होना उसी नारी आधारित बाजारवाद का हिस्सा है। हमारी विशालकाय आबादी उपभोक्ता के रूप में दुनिया को आकर्षित करती है और नासमझ नारियों की स्वार्थलिप्सा उनको गिरा रही है। मीडिया,चैनल,टीवी और इंटरनेट तथा उद्योगपति अपना धंधा चमका रहे हैं। हम समाज में ऐसी नारियों को प्रतिनिधि बनाकर सम्मानित कर रहे हैं जो आए दिन बलात्कार के किसी न किसी चरण तक सहर्ष पहुँचने वाले दृश्य को समाज में पहुँचाकर बाजारवाद को बढ़ा रही हैं…पैसे कमा रही हैं…बलात्कार की भावना को प्रज्वलित कर रही हैं। शयनकक्ष के गोपनीय सहवास को कुछ तथाकथित लोग हँसते हुए सार्वजनिक कर रहे हैं…फ्लैट की सीढ़ियों से सड़कों तक ला रहे हैं जिनके खिलाफ हमारा समाज आवाज नहीं उठाता…कानून दोषी नहीं मानता,लेकिन ये अबोध बच्चों में उस पल को जी लेने की प्रबल आतुरता अंकुरित कर जाते हैं। छुपते-छुपाते तृप्ति के साधन तलाशे जाने लगते हैं जो बलात्कार तक पहुँचा सकता है। अभिभावक बच्चों को सही-गलत समझाने की जहमत नहीं उठाते।
सिर्फ कानून का लचीलापन या फैसले की देरी ही जिम्मेवार नहीं है इस बढ़ते अपराध के लिए। सर्वप्रथम जिम्मेवार वह परिवार है जो बलात्कारी को त्यागने की बजाय संरक्षण व सहानुभूति देता है,पीड़ित-पीड़िता को तिरष्कृत कर अकेला छोड़ देता है। इस तरह अगले बलात्कार एवं नये-नये बलात्कारी को न्योता देता है,समृद्ध एवं सम्वर्द्धित करता है। यह कदापि न भूलें कि आज के बच्चे बड़ों का आदेश नहीं मानते लेकिन नकल अवश्य करते हैं। इसलिए अपनी छवि और उससे निर्मित परिवेश को स्वच्छ बनाएँ। भावी पीढ़ी और उनसे निर्मित समाज स्वयमेव ही सही दिशा पर चलकर उचित दशा को प्राप्त कर लेगा।

परिचय-अवधेश कुमार विक्रम शाह का साहित्यिक नाम ‘अवध’ है। आपका स्थाई पता मैढ़ी,चन्दौली(उत्तर प्रदेश) है, परंतु कार्यक्षेत्र की वजह से गुवाहाटी (असम)में हैं। जन्मतिथि पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर है। आपके आदर्श -संत कबीर,दिनकर व निराला हैं। स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र),बी. एड.,बी.टेक (सिविल),पत्रकारिता व विद्युत में डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त श्री शाह का मेघालय में व्यवसाय (सिविल अभियंता)है। रचनात्मकता की दृष्टि से ऑल इंडिया रेडियो पर काव्य पाठ व परिचर्चा का प्रसारण,दूरदर्शन वाराणसी पर काव्य पाठ,दूरदर्शन गुवाहाटी पर साक्षात्कार-काव्यपाठ आपके खाते में उपलब्धि है। आप कई साहित्यिक संस्थाओं के सदस्य,प्रभारी और अध्यक्ष के साथ ही सामाजिक मीडिया में समूहों के संचालक भी हैं। संपादन में साहित्य धरोहर,सावन के झूले एवं कुंज निनाद आदि में आपका योगदान है। आपने समीक्षा(श्रद्धार्घ,अमर्त्य,दीपिका एक कशिश आदि) की है तो साक्षात्कार( श्रीमती वाणी बरठाकुर ‘विभा’ एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा)भी दिए हैं। शोध परक लेख लिखे हैं तो साझा संग्रह(कवियों की मधुशाला,नूर ए ग़ज़ल,सखी साहित्य आदि) भी आए हैं। अभी एक संग्रह प्रकाशनाधीन है। लेखनी के लिए आपको विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत किया गया है। इसी कड़ी में विविध पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन जारी है। अवधेश जी की सृजन विधा-गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधाएं हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जनमानस में अनुराग व सम्मान जगाना तथा पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जनभाषा बनाना है। 

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