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बहू नमक की तरह होती है..

निशा सतीशचन्द्र मिश्रा यामिनी
मुंबई(महाराष्ट्र)
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मुरैना भदोही गांव की रहने वाली रेवा का इलाहाबाद के एक बड़े व्यापारी के बेटे सरजू के साथ ब्याह हुआl नए घर में बड़े ही आदर-सम्मान के साथ रेवा ने गृहप्रवेश कियाl शादी के दो-तीन साल काफी मजे और ख़ुशी के साथ निकल गए और जैसे-जैसे दिन बीतता गया,रेवा अपनी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबती चली गईl रेवा की सास भी रेवा से काफी खुश थी कि,रेवा बहू अपना घर-संसार और सब-कुछ अच्छी तरह से संभालने लगी हैl गर्मी की छुट्टी पड़ गई,तो रेवा ने अपने मायके जाने की बात अपनी सास से बोली-“मम्मी दो साल हो गए,मैं मायके नहीं जा पाईl क्या मैं थोड़े दिन जाकर आऊं ?” सास ने जवाब दिया-“देखो रेवा अगले साल चले जानाl”
रेवा यह सुनकर काफी नाराज और दु:खी होकर सोचने लगी कि,जब चंचल दीदी हर तीन महीने पर घर आती है तो मम्मी काफी खुश होती है और कहती है कितने दिन के बाद आई हो और मुझे दो साल हो गएl मेरे बारे में कोई कुछ सोचता ही नहीं है,मेरी ख़ुशी किसी के लिए कोई मायने ही नहीं रखती हैl क्या दिनभर इन लोगों को खाना बना के खिलाती रहूँ,घर का सारा काम करती रहूँ क्या ? मेरी यही जिन्दगी है और रेवा कमरे में आँसू की धारा समेटे दाखिल हुईl शाम को चंचल दीदी आने वाली है,देखना मम्मी कितना खुश होती हैl खाने के लिए अलग-अलग फरमाईश की लड़ी लगाती रहेगी कि कभी चंचल दीदी के लिए समोसा बना दो,कभी पालक पनीर,तो कभी बिरयानी…l मैं इतना क्यों सोच रही हूँ ? करना तो मुझे ही है,तो चलूं किचन में..अभी से तैयारी में लग जाऊंl यह सोच ही रही थी कि तभी सास ने आवाज दी-“रेवा जल्दी नीचे आओ,देखो चंचल आई हैl” रेवा अपने चेहरे पर मुस्कान लिए अपने दु:ख को अंदर एक कोने में दबाए अपनी ननद का स्वागत करती हैl
“कैसी हो भाभी ?’ चंचल रेवा से बोलीl
“अच्छी हूँ दीदी और घर में सब कैसे हैं,अच्छे हैंl अच्छा हमारे जीजा जी कैसे हैं ?”
चंचल शरमाते हुए कहती है-“भाभी,वह भी अच्छे हैंl”
“अच्छा दीदी आप बैठो,मैं नाश्ता बनाकर लाती हूँl”
“नहीं… नहीं भाभी,कुछ मत बनाओl मैं अभी घर से नाश्ता करके आई हूँ और भाभी केवल दो-तीन घंटे ही रहूंगी,क्योंकि सास की तबीयत ठीक नहीं हैl आपके जीजा जी उन्हें लखनऊ दिखाने गए हैं तो वो बोले तुम अकेली यहां क्या करोगी। एक काम करो तुम अपने मायके जाकर सबसे मिलकर चली आओ,सो मैं आ गई।” मुस्कुराते हुए चंचल ने जवाब दिया। “अच्छा दीदी रुको,मैं खाना बना देती हूँ। आप खा भी लीजियेगा और जीजाजी एवं आपकी सास के लिए भी बांध कर दे दूंगी।”
“अरे भाभी,मेरे साथ बैठो बातें करो। शाम तक मैं चली जाऊंगी,खाना तो बनता ही रहेगा।” तभी रेवा की सास ने रेवा से कहा-“तुम एक काम करो,चंचल के साथ बैठो,बातें करो। मैं कुछ बनाती हूँ।”
“जी नहीं.. मम्मी जी मैं बनाती हूँ,आप दीदी से बात कीजिए।” तभी कहा चंचल ने कहा-“कोई बात नहीं,आप खाना बनाओ और मैं आपसे बातें करुंगी,थोड़ी मदद हो जाएगी। यह ठीक रहेगा,क्यों माँ !” रेवा की सास बोली-“ये भी सही है।
रेवा और चंचल किचन में प्रवेश करती है और काफी देर तक हँसी मजाक करते-करते खाना भी तैयार हो जाता है।
चंचल खाना खाने के बाद शाम को अपने घर चली जाती है। इधर रसोई को समेटकर रात को अपने कमरे में रेवा गई तो सरजू ने कहा-“रेवा तुम काफी थक गई हो। आराम कर लो।”
“हाँ,मुझे आराम कहां है! तुम्हारी माँ तो बस यही चाहती है कि मैं अपने मायके ना जाऊं। चंचल दीदी एक-दो घंटे के लिए आती है,लेकिन मिलकर तो जाती है।”
“उसमें क्या ? तुम भी चली जाओ रेवा।” सरजू ने कहा। “और देखो रेवा दीदी भी कहां आ पाती आती है। जब शरद जीजाजी अपनी माँ को लखनऊ डॉक्टर के पास दिखाने ले जाते हैं,तभी मिलने आती है।”
“तो इसका मतलब है मैं कभी नहीं जा सकती अपने मायके!”
“ऐसा तो मैंने नहीं कहा रेवा। अच्छा तुम शांत रहो,मैं कल माँ से बात करता हूँ। तुम अपने मायके चली जाना,ठीक है।”
“तुम तो रहने दो।” गुस्सा करते हुए रेवा सो जाती है।
सुबह उठकर रेवा अपने काम में रोज की तरह लग जाती है। दोपहर में शर्मा आंटी रेवा की सास से मिलने आती है,और काफी देर तक बातें करती रहती है। तभी शर्मा आंटी रेवा की सास से पूछती है-“चंचल की माँ ये बताओ कि बहू और बेटी में क्या फर्क समझती हो ?” रेवा इस सवाल के जवाब का इंतजार कर रही थी कि मम्मी जी का इस पर क्या जवाब होगा। रेवा की सास मुस्कुराते हुए बोली-“बेटी कैसी भी हो,पर वह मीठी होती है। बहू नमक की तरह नमकीन होती है।” यह सुनते ही रेवा निराश होती है और दिल भी काफी दु:खी हो जाता है। शर्मा आंटी चली जाती है। काफी देर तक रेवा यह सोचती है कि मैंने मम्मी के साथ क्या बुरा किया है ? मम्मी मेरे बारे में ऐसा क्यों सोचती हैं और वह अब घर में निराश रहने लगती है। रेवा निराश देखकर एक दिन सास ने पूछा-“रेवा यहाँ आओ। तुमसे कुछ किसी ने कहा है क्या ? या सरजू ने कुछ बोला क्या ?” “कुछ नहीं… मम्मी जी।” रेवा की आवाज में दर्द था। रेवा की सास ने अपने पास बिठाकर पूछा- “नहीं… तुम बताओ रेवा क्या हुआ है ?” रेवा की आँखों में आँसू भर आए। फिर रेवा ने सास को सारी बात बता दी कि कैसे शर्मा आंटी से आप बेटी और बहू में फर्क बता रही थी।
“ओह …तो यह सुनकर तुम नाराज हो गई। बस इतनी-सी बात। अरे … रेवा मैंने कहा बेटी मीठी होती है वह चाहे कितनी भी गलती करे उसकी गलती नजर ही नहीं आती है। वह गुड़ की तरह मुँह में घुल जाती है। और अगर खाने में मीठा न हो,तो कोई फर्क नहीं पड़ता है,पर बहू नमक के सामान इसलिए है,क्योंकि खाने में अगर नमक न हो तो खाना बेस्वाद होता है। खाने में नमक मिलने पर हम जो खाना खाते हैं उसी समय हम नमक कॆ कर्जदार बन जाते हैं, ठीक उसी तरह तुम मेरे लिए वही नमक हो। मैं अपने स्वार्थ के लिए तुम्हें कहीं नहीं जाने देती हूँ,क्योंकि तुम्हारे न रहने पर घर सूना-सा लगता है। तुम इस घर को संभालती हो,इसीलिए हम तुम्हारे कर्जदार हैं।”
रेवा सारी बात समझ जाती है और अपनी सास के गले लिपट कर रोने लगती है। शाम को सरजू जब घर आता है तो अपनी माँ से कहता है-“माँ,रेवा अपने मायके जाना चाहती है एक दिन के लिए।” रेवा तपाक के बोल उठी-” नहीं….नहीं मुझे नहीं जाना है। मैं चली गई तो खाने में कोई स्वाद नहीं रहेगा।”
सरजू को कुछ समझ नहीं आया कि कल रात मायके जाने के लिए मुझसे कह रही थी, अचानक से इसे क्या हो गया। सरजू सोचने लगा कि इन औरतों को समझना मर्दों के बस के परे है। रेवा की सास,रेवा के सिर पर हाथ फेरकर लाड़ कर रही थी,और सरजू एकटक रेवा और अपनी माँ को देखता रहा।

परिचय-निशा सतीशचन्द्र मिश्रा का साहित्यक उपनाम `यामिनी` है। आपकी जन्मतिथि२५ फरवरी १९८५ और स्थान उत्तरप्रदेश है। स्थाई और वर्तमान पता पंतनगर, घाटकोपर(ईस्ट)मुंबई है। महाराष्ट्र राज्य के शहर मुंबई की निवासी निशा मिश्रा की शिक्षा- एम.ए.,बी.एड एवं पी.एच-डी. है। पेशे से आप निजी महाविद्यालय में प्राध्यापिका हैं। लेखन विधा-कविता,लेख और दोहा है। प्रकाशन में ऑनलाइन औरइलाहाबाद के पत्रों में भी रचनाओं को स्थान मिला है। प्राप्त सम्मान में प्रमुख तौर पर ममता कालिया के उपन्यास ‘बेघर’ की समीक्षा पर द्वितीय पुरस्कार २०१८ सहित अच्छे शिक्षक का सम्मान २०१७,मृदुला गर्ग के उपन्यासों की चर्चा पर प्रथम पुरस्कार २०१७ मिला है। यामिनी सामाजिक मीडिया पर भी लिखती हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-अपनी भावनाओं को लोगों तक विस्तारित करना और हिंदी भाषा की सेवा करना है।