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बात कीजिए, संवाद साधिए

गोपाल मोहन मिश्र
दरभंगा (बिहार)
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निरंतर संवाद एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के समान है, जो लोगों को अकेलेपन और नैराश्य से दूर रखता है। संवाद मानसिक संबल प्रदान करने के साथ-साथ सुरक्षा भी प्रदान करता है। इससे समाज में होने वाली कई दु:खद घटनाओं को रोका जा सकता है।
कुछ समय पहले सामाजिक संचार माध्यम पर एक चल-चित्र देखा था। पति-पत्नी दोनों एक ही दफ्तर में कार्यरत थे। दिन के लगभग ८-९ घंटे एकसाथ बिताते थे। काम के प्रति दोनों की आस्था और दोनों का तालमेल बहुत अच्छा था। कोई भी नया काम शुरू करने के पहले एक-दूसरे के विचारों को सुनना, क्या नया किया जा सकता है इस बारे में चर्चा करना, परियोजना से सम्बंधित क्या कार्य किसे करना है आदि जैसे सारे काम सुनियोजित तरीके से पूर्ण हो जाते थे। दफ्तर आने-जाने के समय भी दोनों साथ ही निकलते थे। अत: दफ्तर और घर की कई सारी बातें, कई काम एकसाथ हो जाते थे, परंतु धीरे-धीरे उनका साथ-साथ आना-जाना कम होने लगा। कभी पत्नी को घर के कामों के कारण निकलने में देर हो जाती, तो कभी पति को बाहर की बैठक के कारण सुबह जल्दी निकलना पड़ता। घर आने के बाद भी दफ्तर की ही चर्चा होती थी। घर-परिवार के बारे में, एक-दूसरे के बारे में बात करने का समय दोनों के पास नहीं बचता था। छुट्टियों के दिनों में पति अपने दोस्तों से मिलने निकल जाता, तो पत्नी घर की खरीदारी करने।
इन सभी कारणों से दोनों के बीच संवाद कम होने लगा और दूरियाँ बढ़ने लगी। पहले जिन समस्याओं का समाधान चर्चा करके, बातें करके निकलता था, अब वे दोनों एक-दूसरे को ही उन समस्याओं का कारण मानने लगे थे। जब भी बात करते, बस आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता। एक-दूसरे की कमियाँ निकालने लगते। प्रेम तथा सामंजस्य की जगह क्रोध तथा अहं भाव ने ले ली थी। दोनों ही अत्यंत कठिन भावनात्मक दौर से गुजर रहे थे, परंतु स्थिति को सुधारने के लिए संवाद साधने की पहल कोई नहीं कर रहा था।
एक बार तो झगड़ा इतना बढ़ गया कि दोनों यह सोचने लगे कि एक-दूसरे से ऊब गए हैं। इसी बीच २ दिन की छुट्टियाँ आ गईं। दोनों ने ही एक-दूसरे को बिना बताए सारा दिन घर पर ही रहने का निश्चय किया। पत्नी ने पति की पसंद का भोजन बनाया, दोनों ने फिल्म देखी, शाम को घूमने चले गए। कुल मिला कर दोनों ने सारा वक्त एक-दूसरे के साथ गुजारा। दफ्तर के काम और परियोजना के अलावा भी ढेर सारी बातें कीं। सारे गिले-शिकवे दूर हो गए और रिश्तों की गाड़ी फिर से पटरी पर लौट आई।
यह छोटा-सा चल-चित्र हर उस कामकाजी दम्पति की कहानी है, जो यह महसूस करने लगे हैं कि वे एक-दूसरे से ऊब रहे हैं। समय और संवाद की यह कमी केवल पति-पत्नी के रिश्ते में ही दिखाई देती है, ऐसा नहीं है। माता-पिता और बच्चे, भाई-बहन, दोस्त आदि सभी सम्बंधों में कमोबेश दिखाई देती है। परिवार के रूप में एकसाथ बिताए जाने वाले वक्त में भी बहुत कमी आ गई है।
कुछ समय से देश के विभिन्न शहरों में जो घटनाएं हुईं, उनकी भावानात्मक पड़ताल करें तो यही सामने आएगा कि किस तरह संवादहीनता ने कई बड़े हादसों को अंजाम दिया है। किसी महानगर के एक फ्लैट में अकेली वृद्धा स्त्री का कंकाल मिलने जैसी घटना भी अंदर तक यह सोचने पर मजबूर कर देती है, कि कैसे कोई बेटा अपनी माँ के कुशलक्षेम लेने तक की जहमत नहीं उठाता ? कैसे उसे इतने दिनों तक यह पता नहीं चलता कि उसकी माँ का देहांत हो गया है ? कैसे आस-पड़ोस में रहने वाले लोग इतने बेपरवाह हो जाते हैं कि कई दिनों तक किसी घर का दरवाजा न खुलने पर भी किसी को कोई सरोकार नहीं होता ? महिला की मृत्यु के पश्चात उसके बेटे पर कई प्रश्नचिह्न थे, परंतु महिला के जीवित रहते हुए आस-पड़ोस के लोगों से उसके कितने अच्छे सम्बंध थे ? अगर वह निरंतर आस-पड़ोस के लोगों से मिलती रहती, उनसे बात करती रहती, तो शायद घटना का अंत इतना विदीर्ण न होता।
संवाद की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है बच्चों को। कच्ची उम्र में अमूमन हर बच्चा यह चाहता है कि कोई न कोई उससे बात करता रहे, उसकी सुनता रहे। विद्यालय, बस, मित्र, अध्यापक इत्यादि सब-कुछ उसके लिए नया होता है। वह अपना अधिकतम समय इन सबके बीच गुजारता है और जब वह घर आता है,तो अत्यंत उत्साह में सभी को दिनभर की बातें सुनाता है। बच्चों की ये बातें सुनना अत्यंत आवश्यक है। ये एक तरह से बच्चों में विश्वास पैदा करती है कि उनकी सुनने वाला कोई है और दूसरी ओर बड़ों को आगामी खतरों से आगाह भी कराती है। उनकी बातों से और हाव-भाव से अभिभावकों को यह समझने में आसानी होती है कि उसके साथ दिनभर में क्या हुआ।
ऐसा कोई व्यक्ति होना अत्यंत आवश्यक है जिसके साथ हर तरह की बात की जा सकती हो, जिसके सामने अपने मनोभावों को आसानी से व्यक्त किया जा सकता हो। कभी-कभी जीवन में मिली छोटी सी असफलता भी लोग पचा नहीं पाते और ऐसा कोई व्यक्ति भी उनके जीवन में नहीं होता जो उनकी असफलता से उबरने में मदद कर सके। धीरे-धीरे असफलता उनके मन में निराशा की भावना उत्पन्न कर देती है और यह भावना इतनी प्रखर होती जाती है कि व्यक्ति आत्महत्या भी कर लेता है। अत: निराशा के स्तर पर अगर व्यक्ति से संवाद शुरू कर दिया जाए, तो निश्चित ही उसे आत्महत्या करने से तो रोका जा ही सकता है, सफल होने की ओर भी प्रेरित किया जा सकता है।
संवाद मानसिक संबल प्रदान करने के साथ-साथ सुरक्षा भी प्रदान करता है।
एक किस्सा सुना कि अकेली रहने वाली वृद्ध महिला अचानक बीमार पड़ गई और भर्ती कराना पड़ा। दूसरे शहर गया हुआ उनका बेटा जब अस्पताल पहुंचा तो अपनी माँ के समवयस्क लोगों से उसने पूछा कि आपको माँ की बीमारी की खबर कैसे मिली ? उन व्यक्तियों ने जवाब दिया, ‘‘सोसायटी में साठ साल के ऊपर जितने भी लोग हैं, वे सभी शाम को नियत समय पर बगीचे में मिलते हैं। अगर कोई नहीं आता या कोई खबर नहीं आती, तो सब उसके घर पहुंच जाते हैं। उन लोगों का व्हाट्सएप पर एक ग्रुप भी है,जिस पर नियत समय के अंतराल से संदेश भेजने का नियम है। अगर किसी का संदेश नहीं आता, तो उसकी पड़ताल शुरू हो जाती है और वास्तविकता का पता चल जाता है। आज सुबह जब तुम्हारी माँ का संदेश नहीं आया, हमारे संदेशों का भी उन्होंने जवाब नहीं दिया तो हम उनके घर पहुंच गए। उनकी तबियत ठीक न होने के कारण अस्पताल ले आए और तुम्हें भी खबर कर दी।’’
कंकाल में परिवर्तित हो चुकी उस वृद्ध महिला और समय रहते अस्पताल में भर्ती महिला के बीच अंतर यही है कि उनका किसी से कोई संपर्क नहीं था, संवाद नहीं था और इनके परिचितों की कोई कमी नहीं थी।
समय की कमी को संवेदनहीनता का सबसे बड़ा कारण बताया जाता है, परंतु आज संवाद साधने के इतने सारे साधन मौजूद हैं कि आपको किसी के पास जाने की जरूरत नहीं है। आवश्यक नहीं है कि आप रोज मिलें, बल्कि आवश्यक यह है कि आप रोज बात करें। अपना मन हल्का करने के लिए, किसी और का मन हल्का करने के लिए भी। अपनी सुरक्षा के लिए और अपनों की सुरक्षा के लिए भी। बातें कीजिए, संवाद साधिए।

परिचय–गोपाल मोहन मिश्र की जन्म तारीख २८ जुलाई १९५५ व जन्म स्थान मुजफ्फरपुर (बिहार)है। वर्तमान में आप लहेरिया सराय (दरभंगा,बिहार)में निवासरत हैं,जबकि स्थाई पता-ग्राम सोती सलेमपुर(जिला समस्तीपुर-बिहार)है। हिंदी,मैथिली तथा अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले बिहारवासी श्री मिश्र की पूर्ण शिक्षा स्नातकोत्तर है। कार्यक्षेत्र में सेवानिवृत्त(बैंक प्रबंधक)हैं। आपकी लेखन विधा-कहानी, लघुकथा,लेख एवं कविता है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। ब्लॉग पर भी भावनाएँ व्यक्त करने वाले श्री मिश्र की लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक- फणीश्वरनाथ ‘रेणु’,रामधारी सिंह ‘दिनकर’, गोपाल दास ‘नीरज’, हरिवंश राय बच्चन एवं प्रेरणापुंज-फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शानदार नेतृत्व में बहुमुखी विकास और दुनियाभर में पहचान बना रहा है I हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान की प्रबल धारा बह रही हैI”

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