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बाल मजदूरी

सुश्री अंजुमन मंसूरी ‘आरज़ू’ 
छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश)
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आज प्राचार्य पद से अनूप जी की सेवानिवृत्ति का दिन था। चूँकि,वे बहुआयामी प्रतिभा एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी होने के साथ ही, गरीबों के मसीहा भी थे,अतः उनकी सेवानिवृत्ति पर पुराने सहकर्मी, निवर्तमान विद्यार्थी और ग्रामीणों से विद्यालय प्रांगन खचाखच भरा था।
बहुत ही आदरपूर्वक अनूप जी को मंचासीन किया गया और बारी-बारी से सभी ने अपने उदगार प्रकट किए। अनूप जी भी हर्ष और विषाद के मिश्रित भाव से अतीत के गलियारों में खो गए,कि किस प्रकार पिता की असमय मृत्यु के बाद,माँ ने हमें मजदूरी करके पाला। कभी काम न मिलता तो फाँकों पर भी गुजरती थी। थोड़ा समय बीता और मैं कुछ बढ़ा हुआ। विद्यालय से लौटने के बाद और छुट्टी वाले दिन,मैं भी माँ के कामों में हाथ बँटाता,जिसके लिए मुझे अलग से कोई मजदूरी तो नहीं मिलती, पर हाँ,मेरे काम करने से माँ को अगले दिन काम मिलने में थोड़ी कम कठिनाई होती। थोड़ा और बड़ा हुआ,तो मुझे भी काम मिलने लगा,जिससे कॉपियों का खर्च निकल जाता था। पुस्तकें तो अपने सहपाठियों को गणित और अंग्रेजी फिर से समझाने के बदले मांग कर पढ़ता था मैं….l
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मंच संचालक ने संबोधित किया-“अब आदरणीय अनूप जी अपने जीवन के अनुभव हमसे साझा करेंगे,कि उनकी सफलता का राज क्या है।” अनूप जी की तंद्रा टूटी,उनकी आँखों में अतीत के आँसू झिलमिला रहे थे। उन्होंने जीवन का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अंत में यह कहा-“यदि आप मेरे इस जीवन को सफल मान रहे हैं,तो इसका श्रेय,माँ की तपस्या,मेहनत और मेरी लगन के अतिरिक्त,उस समय बाल श्रम पर कड़ाई से प्रतिबंध का न होना है,यदि मैं बचपन में मजदूरी नहीं कर पाता,तो आज मजदूर ही होता।”

परिचय-सुश्री अंजुमन मंसूरी लेखन क्षेत्र में साहित्यिक उपनाम ‘आरज़ू’ से ख्यात हैं। जन्म ३० दिसम्बर १९८० को छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) में हुआ है। वर्तमान में सुश्री मंसूरी जिला छिंदवाड़ा में ही स्थाई रुप से बसी हुई हैं। संस्कृत,हिंदी एवं उर्दू भाषा को जानने वाली आरज़ू ने स्नातक (संस्कृत साहित्य),परास्नातक(हिंदी साहित्य,उर्दू साहित्य),डी.एड.और बी.एड. की शिक्षा ली है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक(शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय)का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप दिव्यांगों के कल्याण हेतु मंच से संबद्ध होकर सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-गीत, ग़ज़ल,हाइकु,लघुकथा आदि है। सांझा संकलन-माँ माँ माँ मेरी माँ में आपकी रचनाएं हैं तो देश के सभी हिंदी भाषी राज्यों से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं तथा पत्रों में कई रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। बात सम्मान की करें तो सुश्री मंसूरी को-‘पाथेय सृजनश्री अलंकरण’ सम्मान(म.प्र.), ‘अनमोल सृजन अलंकरण'(दिल्ली), गौरवांजली अलंकरण-२०१७(म.प्र.) और साहित्य अभिविन्यास सम्मान सहित सर्वश्रेष्ठ कवियित्री सम्मान आदि भी मिले हैं। विशेष उपलब्धि-प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के शिष्य पंडित श्याम मोहन दुबे की शिष्या होना एवं आकाशवाणी(छिंदवाड़ा) से कविताओं का प्रसारण सहित कुछ कविताओं का विश्व की १२ भाषाओं में अनुवाद होना है। बड़ी बात यह है कि आरज़ू ७५ फीसदी दृष्टिबाधित होते हुए भी सक्रियता से सामान्य जीवन जी रही हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-अपने भावपूर्ण शब्दों से पाठकों में प्रेरणा का संचार करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महादेवी वर्मा तो प्रेरणा पुंज-माता-पिता हैं। सुख और दु:ख की मिश्रित अभिव्यक्ति इनके साहित्य सृजन की प्रेरणा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
हिंदी बिछा के सोऊँ,हिंदी ही ओढ़ती हूँ।
इस हिंदी के सहारे,मैं हिंद जोड़ती हूँ॥ 
आपकी दृष्टि में ‘मातृभाषा’ को ‘भाषा मात्र’ होने से बचाना है।