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बेचारी हिन्दी

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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‘विश्व हिन्दी (१० जनवरी) विशेष’…

“अजी सुनते हो क्या ? देखना कौन आया है ?” -किवाड़ों के अन्दर से देशी अंदाज में हिन्दी बोली।

“अजी कौन आया है ?, वही पछुआ डायन आई है और कौन ?”-हिन्दुस्तान कुछ ऐसे बोला, मानो उसे किसी का आना पसन्द ही न हो।
“अच्छा-अच्छा! तो अंग्रेजी आई है।”-अन्दर से हिन्दी ने फटी-सी आवाज में कहा।

“और नहीं तो क्या ?”- हिन्दुस्तान ऊबता हुआ-सा बोला।
“चलो छोड़ो भी जी! अपने काम से काम रखो। ज्यादा मुँह मत लगना तुम इस नकचढ़ी के। विदेश से आई है। क्या पता, नासपीटी क्या कर जाए ? डर लगता है जी। फिर तुम मर्द जात का क्या ? जाने कब दिल दे बैठे ? मुझे तो आपकी चिन्ता सताए जा रही है जी ?”-हिन्दी हिन्दुस्तान का सिर सहलाते हुए बोली।
“तुम औरतों की न, यही रश्क होती है बस! कोई पराई स्त्री घर के आस-पास दिखी नहीं कि, लग गई पति पर शक करने। तुम्हारी यही अदा हम मर्दों को पसन्द नहीं आती।”- हिन्दुस्तान झुंझलाते हुए बोला।
“यह अदा तो तुम मर्दों की भी हम स्त्रियों को अच्छी नहीं लगती है जी!, पर इसमें जीते सभी हैं। मेरे हिसाब से जीना भी चाहिए। इसी को तो दाम्पत्य जीवन का उत्कर्ष कहते हैं। एक-दूसरे पर अपना हक समझना और एक दूसरे से डरना।”-हिन्दी उदास भाव से गहन विचारों में डूबते हुए बोली।
दिन बीते, दोनों की गृहस्थी प्यार-प्रेम से चलती रही। इधर हिन्दी की जायी अवधि, ब्रज, भोजपुरी तथा खड़ी बोली आदि ने हिन्दी के चिर यौवन काल भक्ति युग से जन्म लेना प्रारंभ किया था और रीति काल से होते हुए अब आधुनिक काल में प्रवेश किया, पर इसी बीच हिन्दुस्तान विदेशी बंजारन के लटकम-झटकम में आखिर फंस ही गया।
१८३६ का वह दिन। मैकाले का षड्यंत्र, “हिन्दुस्तान को अपनी गिरफ्त में लेना है तो हजूर हमें हिन्दुस्तान की भार्या से उसे अलग करवाना होगा!”
मैकाले की बात को तरजीह देते हुए ब्रिटिश हुकूमत बोली, “वह कैसे? “
“भारत की शिक्षा पद्धति को कान्वेंट स्कूलों की पद्धति में बदल कर! ” मैकाले बोला।
“वह तो ठीक है, पर यह काम करेगा कौन ? हिंदुस्तान और हिन्दी के रिश्ते में दरार डालना खाला जी का बाड़ा नहीं है!” ब्रिटिश हुकूमत बोली।
“यह काम तुम मुझ पर छोड़ दो सरकार!” अंग्रेजी तपाक से बोली।
“अच्छा तो शुभ काम में देर क्यों ? हो जाओ शुरू।” ब्रिटानिया हुकूमत बोली।
फिर क्या था १८३६ से अंग्रेजी और मैकाले ने मिल कर हिन्दुस्तान और हिन्दी के बीच दरार डालने की मुहिम शुरू कर दी। इसी कड़ी में ५६ में बम्बई में पहला कान्वेंट स्कूल खुला। अभी भारतीय लोग ऐसी शिक्षा प्रणाली से अपने बच्चों को दूर रख रहे थे। बहुत कम लोग ही इसमें अपने बचों को भेजते। धीरे- धीरे समय बदला और गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था तोड़ी-मरोड़ी गई। कालांतर में पूरा हिन्दुस्तान अंग्रेजी के चंगुल में कुछ यूँ फंसा कि, हिन्दी को हेय और दोयम दर्जे की समझने लगा।
“मर्दुए होते ही ऐसे हैं बेटी!, पर तुम अपनी हिम्मत मत छोड़ना!” हिन्दी ने ब्रज से उसके प्रश्न का उतर देते हुए कहा। हुआ यूँ कि, ब्रज ने हिन्दुस्तान की ताजा स्थिति पर माँ से चर्चा शुरू की थी कि, आजकल हिन्दुस्तान क्यों हिन्दी को तवज्जो नहीं देता।
१९४२ में भारतीय स्वतंत्रता का संघर्ष और तेज हुआ। भारत की जनता में खासा जोश था। इसी कड़ी में १५ अगस्त १९४७ को भारत आजाद हुआ, पर हुकूमतें बदल जाने पर भी हिन्दुस्तान का रुझान हिन्दी के प्रति परिवर्तित नहीं हुआ। गोरों का स्थान भारतीयों ने जरूर लिया, परंतु हिन्दी फिर भी अपने ही घर में दोयम दर्जे की ही रही।
१९४८-४९ में हिन्दुस्तान पर हिन्दी को स्वीकार करने का दबाव बढ़ने लगा। हिन्दी बोली,-“आपको यह भी खबर है कि, इस डायन ने आपके अपने बच्चों को कहां ला खड़ा किया ?”
“क्या नहीं दिया अंग्रेजी ने हमारे बच्चों को, हिन्दी तू तो यूँ ही बस इससे चिढ़ती है।” हिन्दुस्तान मुँह फेरते हुए बोला।

“हाँ-हाँ, खूब समझती हूँ मैं सब। क्या दिया है इसने हमारे बच्चों को ? सारे के सारे रट्टामार और सट्टामार बना दिए और ज्यादा से ज्यादा क्लर्क बना दिए हैं। शासन-प्रशासन उसी नकचढ़ी के लालों के हाथ में रहा, पर तुम्हें क्यों समझ आने लगा जी! आप पर तो इस निगोड़ी ने जादू-टोना कर के रखा है। अब सत्ता परिवर्तन हो गया है। अब तो मैं इस कुलच्छनी को कतई बर्दाश्त न करूंगी।” हिन्दी त्यौरियाँ चढ़ाते हुए बोली।
सभी में खुशी की लहर छाने लगी कि, अब हिन्दुस्तान से अंग्रेजी का बिछुड़ना लाजमी है। बेचारी हिन्दी को उसका हक मिलना जरूरी है, पर इसी बीच अंग्रेजी के चहेतों ने दक्षिण भारत में हिन्दी परिवार में ही फूट डाल दी। ऐसा बखेड़ा खड़ा कर दिया कि, अंग्रेजी को आजादी के बाद भी हिंदुस्तान की चहेती ही बनाए रखा और बेचारी हिन्दी को दोयम दर्जे की स्थिति में रखा है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि, सौतन तो सौतन ही होती है, पर हाँ यह जरूर है कि, आज विश्व पटल पर हिन्दुस्तान की विशेष पहचान का कारण हिन्दुस्तान की भार्या ही बनी है। विश्व के कई देशों में उसका मान-सम्मान किया जा रहा है और कई देशों के विश्वविद्यालयों में भी पढ़ाया जा रहा है। आज दुनिया की तीसरी भाषा के रूप में हिन्दी उभर रही है। आशा है कि, बहुत जल्द हिन्दुस्तान हिन्दी के प्रेम को समझेगा और अंग्रेजी के चंगुल से निजात पाएगा। खैर यह बात अब हिंदुस्तान की समझ में भी धीरे-धीरे आने लगी है कि, अपनी भार्या तो अपनी ही होती है।