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बेजान पत्थर

मनोज कुमार सामरिया ‘मनु’
जयपुर(राजस्थान)
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ना मन्दिरों में महफूज है,
ना मस्जिदों में सलामत है।
कलियों के खिलने पर अब,
बागों-बगीचों में भी बगावत है।
अब तलक यकीं था कि,
बसता है तू कहीं पत्थर की मूरत में
तू रहनुमाँ है कहीं कुरान की सूरत में…
पर भोला था मैं जो,
यकीं कर बैठा माँ के विश्वास में।
और तू…
तू बस तमाशाबीन बन देखता रहा,
लुटते हुए उस नन्हीं जान को…
तेरी ही मूरत के आगे दालान में,
होती रही दरिंदगी की हदें पार…
नोंचता रहा एक जानवर,
जिस्म के टुकड़ों को…
और तू …
तू बुत बना देखता रहा एक-सार…।
तूने आज साबित किया कि ये सच है…
सच है ये कि तुझे बनाया इन्सान ने है,
और उसके आगे तू है बेबस और लाचार…
पूछता हूँ मैं,
कहाँ है तेरा चक्र सुदर्शन ?
कहाँ है तेरा द्रोपदी वाला व्यवहार…..!
रही देखती तेरी निर्मम आँखें,
होती रही मानवता शर्मसार…।
अब तू ही बता कहे कैसे वो,
तुझे भगवान अपना…
कहे किस बिना पर तुझे परवरदिगार…
और हाँ अब…अब स्वीकारता हूँ कि मैं,
नास्तिक हूँ।
ललकारता हूँ मैं मानव होकर तेरे वजूद को…
गर है तू या तेरा वजूद तो क्या,
लौटा सकता है उस नन्हीं जान को
उन दर्द भरे लम्हों की राहत ?
पर मैं फिर क्यों भूल जाता हूँ कि,
तू है तो आखिर बेजान पत्थर…
जिसमें ना संवेदना है…
और ना समझने की ताकत भर…॥

परिचय-मनोज कुमार सामरिया का उपनाम `मनु` है,जिनका  जन्म १९८५ में २० नवम्बर को लिसाड़िया(सीकर) में हुआ है। जयपुर के मुरलीपुरा में आपका निवास है। आपने बी.एड. के साथ ही स्नातकोत्तर (हिन्दी साहित्य) तथा `नेट`(हिन्दी साहित्य) की भी शिक्षा ली है। करीब ८  वर्ष से हिन्दी साहित्य के शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं और मंच संचालन भी करते हैं। लगातार कविता लेखन के साथ ही सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेख,वीर रस एंव श्रृंगार रस प्रधान रचनाओं का लेखन भी श्री सामरिया करते हैं। आपकी रचनाएं कई माध्यम में प्रकाशित होती रहती हैं। मनु  कई वेबसाइट्स पर भी लिखने में सक्रिय हैंl साझा काव्य संग्रह में-प्रतिबिंब,नए पल्लव आदि में आपकी रचनाएं हैं, तो बाल साहित्य साझा संग्रह-`घरौंदा`में भी जगह मिली हैl आप एक साझा संग्रह में सम्पादक मण्डल में सदस्य रहे हैंl पुस्तक प्रकाशन में `बिखरे अल्फ़ाज़ जीवन पृष्ठों पर` आपके नाम है। सम्मान के रुप में आपको `सर्वश्रेष्ठ रचनाकार` सहित आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ सम्मान आदि प्राप्त हो चुके हैंl