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भ्रष्टाचार मुक्ति का माध्यम बने प्रतिज्ञा पत्र

ललित गर्ग
दिल्ली
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नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले प्रधानमंत्री बनते ही भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया। उन्होंने “न खाऊंगा और न खाने दूंगा” का शंखनाद किया। उनके २ बार के प्रधानमंत्री कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाने के लिए अनेक कठोर कदम उठाए गए और उसके परिणाम भी मिले हैं, लेकिन भ्रष्टाचार फिर भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। भ्रष्टाचार की जटिल से जटिल होती स्थितियों को देखते हुए ही केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सरकारी संस्थानों, मंत्रालयों और नागरिकों के लिए ६ बिंदुओं का सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा-पत्र जारी किया है, जिसमें उनसे भ्रष्टाचार मुक्त भारत की संकल्पना के साथ जुड़ने का आह्वान किया गया है। प्रतिज्ञा-पत्र को आयोग ने भ्रष्टाचार मुक्त देश के लिए विशेष अभियान के तौर पर पेश किया है। राष्ट्र में भ्रष्टाचार के विरुद्ध समय-समय पर ऐसी क्रांतियां एवं प्रशासनिक उपक्रम होते रहे हैं लेकिन उनका लक्ष्य, साधन और उद्देश्य शुद्ध न रहने से उनका दीर्घकालिक परिणाम संदिग्ध रहा है। प्रश्न है कि सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र की आवश्यकता क्यों पड़ी, क्या इसका हश्र ‘ढाक के तीन पात’ ही होना है ? देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी ही चाहिए।
ईमानदारी के अभ्युदय के लिए ही इस प्रतिज्ञा पत्र में कहा गया है-जीवन के सभी क्षेत्रों में ईमानदारी से काम करेंगे, नियमों का पालन करेंगे। कभी रिश्वत नहीं लेंगे और न ही देंगे। सभी कार्य ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ करेंगे। जनहित में कार्य करेंगे। अपने आचरण में ईमानदारी दिखाएंगे। भ्रष्टाचार की घटना की सूचना संबंधित एजेंसी को जरूर देंगे। ये संकल्प निश्चित ही जन-जन और प्रशासन में बैठे अधिकारी एवं कर्मचारी ले ले तो भ्रष्टाचार को समाप्त होने में देर नहीं लगेगी, लेकिन छोटे-छोटे भ्रष्टाचार के साथ बड़े भ्रष्टाचार को भी नियंत्रित किया जाना जरूरी है। इसके लिए प्रधानमंत्री ने एक ऐसी क्रांति का शंखनाद किया है जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी एजेन्सियां सक्रिय हुई हैं, जिसने न केवल विभिन्न राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं की चूलें हिला दी है, बल्कि भ्रष्टाचार के प्रश्न पर भी प्रशासन-शक्ति को जागृत कर दिया है।
अब प्रशासन शक्ति जाग गई है तो दलों एवं नेताओं का हिलना, आग-बबूला होना एवं बौखलाना स्वाभाविक है। दरअसल, निष्ठा पत्र ऐसे वक्त में जारी हुआ है, जब माना जाने लगा है कि सरकारी काम बिना लिए-दिए नहीं हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम की जरूरत है, एक जागृति अभियान की आवश्यकता है। सरकारी जांच एजेंसी लगातार राज्यों से लेकर केंद्र में बैठे लोगों पर कार्रवाई भी कर रही है, लेकिन उसका प्रभाव ज्यादा दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में सवाल है कि आखिर इस भ्रष्टाचार को हवा कहां से मिल रही है ? कौन लोग हैं, जो शीर्ष की सख्ती के बावजूद बेखौफ हैं। कौन है जो सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार को जगह दे रहे हैं ? आखिर प्रशासनिक मशीनरी इसको क्यों नहीं रोक पा रही है ?
रिश्वत एक नासूर है। रिश्वत देने वाला काम जल्दी होने की उम्मीद में रिश्वत दे रहा है। लेने वाला काम करने के बदले रिश्वत ले रहा है। यानी भ्रष्ट-व्यवस्था कायम है। काम में विलम्ब या आम आदमी को परेशान करना-यह भ्रष्टाचार को पोषित करने की जमीन है। भले ही अपेक्षित सारे काम करना सरकारी कर्मचारी-अधिकारी की जिम्मेदारी होे, फिर भी भ्रष्टाचार को शिष्टाचार एवं रिश्वत को एक तरह से सुविधा शुल्क मान लिया गया है और इसके लेन-देन को लेकर कहीं कोई अपराध बोध नहीं दिखाई देता। सवाल यही है कि आखिर भ्रष्टाचार को खत्म कैसे किया जाए ? क्या सिर्फ इस तरह के पत्र से भ्रष्टाचार दूर होगा ? असल में जरूरत है नीचे से लेकर ऊपर तक सुधार करने की। नीचे का व्यक्ति तभी सुधर सकता है, जब ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति भी उस सुधार के लिए प्रेरित हो और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हो।
भ्रष्टाचार मट्ठे की तरह राष्ट्र में गहरा पैठा है। राष्ट्रीय स्तर पर १९७१ के बाद भ्रष्टाचार ने देश में संस्थागत रूप ग्रहण कर लिया, विशेषतः राजनीतिक दलों में यह तेजी से पनपा। खुद पर भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार तो दुनियाभर में है। सिर्फ भारत में ही नहीं है।’ विडम्बना तो यह है कि कुछ राजनीतिक दलों ने इसी भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करके सत्ता हासिल की और सत्ता पर बैठते ही भोली-भाली एवं अनपढ़ जनता की आँखों में धूल झोंकते हुए खुलकर भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए हैं।
पुरानी कहावत तो यह है कि ”सच जब तक जूतियां पहनता है, झूठ पूरे नगर का चक्कर लगा आता है।“ इसलिए शीघ्र चर्चित प्रसंगों को कई बार इस आधार पर गलत होने का अनुमान लगा लिया जाता है, पर यहां तो सभी कुछ सच है। घोटाले झूठे नहीं होते। रिश्वत झूठी नहीं होती। सरकारी कामों में लापरवाही एवं जनता को परेशान करने का प्रचलन झूठा नहीं होता। एक बड़ा सच यह है कि खुद सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी भी भ्रष्टाचार के शिकार होते हैं। उन्हें अपनी मन-मुताबिक पदस्थापना के लिए रिश्वत देनी होती है। जब इसमें भ्रष्टाचार होगा, तो फिर उस पर बैठने वाला भी भ्रष्टाचार करेगा। जरूरी है कि इसके खिलाफ लड़ाई पूरे मन से शुरू हो। हर कोई अपने स्तर पर इसके खिलाफ खड़ा हो। शासन स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक इसके खिलाफ माहौल बनना चाहिए, तभी इसका फायदा आम आदमी को मिल पाएगा। अन्यथा भ्रष्टाचार देश को दीमक की तरह चट करता रहेगा। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा है। सत्ता और संपदा के शीर्ष पर बैठकर यदि जनतंत्र के आदर्शों को भुला दिया जाता है तो वहां लोकतंत्र के आदर्शों की रक्षा नहीं हो सकती। राजनीति के शीर्ष पर जो व्यक्ति बैठता है उसकी दृष्टि जन पर होनी चाहिए पार्टी पर नहीं, धन पर नहीं। आज जन एवं राष्ट्रहित पीछे छूट गया और स्वार्थ आगे आ गया है।
जिन राजनीतिक दलों को जनता के हितों की रक्षा के लिए दायित्व मिला है वे अपने उन कार्यों और कर्त्तव्यों में पवित्रता एवं पारदर्शिता रखें तो किसी प्रतिज्ञा पत्र की जरूरत नहीं होगी।
आज भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री अगर चिंता जता रहे हैं, तो देश अच्छी तरह से वस्तुस्थिति को समझ रहा है। निःसंदेह, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ हमें मिलकर कदम उठाने पड़ेंगे। इस बार सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा-पत्र माध्यम बना है तो उसे व्यर्थ न जाने दें।