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मंगल करने वाले शिव

श्रीमती देवंती देवी
धनबाद (झारखंड)
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कार्तिकेय, गणेश, अशोक सुन्दरी के पिता ‘शिव’ कहाते हैं,
खुद जहर को पीने वाले, देवताओं को अमृत पान कराते हैं।

नन्दी, गण, सदैव त्रिशूलधारी की सेवा में रहते हैं तैयार,
महादेव अपने अनुजों से, सदा करते हैं पुत्र जैसा प्यार।

हे देवा माथे में चन्द्रमा शोभता, नाम आपका जटाधारी,
जटाओं से गंगा बहती है, महादानी आप हो, डमरूधारी।

स्वर्णाभूषण के बदले पहने गले में, नाग रुद्राक्ष की माला,
रेशमी वस्त्र छोड़कर प्रभु पहने हैं, बाघ-मृग की छाला।

छप्पन भोग महादेव खाए हीं नहीं, बेलपत्र मन से खाते हैं,
तभी शिवालय में जाकर, नर-नारी बेलपत्र ही चढ़ाते हैं।

हमेशा थक जाती हैं माता गौरा रानी, भांग पीस-पीस कर,
तभी गौरा पिता के घर चली जाती हैं, शंकर से रूठ कर।

अंग-अंग में भभूत रमाए रहते है शंकर जी, हैं त्रिनेत्रधारी,
आदि भी शिव-अन्त भी शिव, मेरे भोले बाबा हैं भंडारी।

कहलाते हैं शिव कैलाश के वासी, रहते हैं श्मशान में,
‘राम’ नाम का जाप करते हैं, बैठकर शिव सुनसान में।

पूज्य पिता परमेश्वर श्री शिव शंकर, दिल के भोले-भाले हैं,
शिव के हृदय में प्रेम का सरोवर है, शिव ‘मंगल’ करने वाले हैं॥

परिचय– श्रीमती देवंती देवी का ताल्लुक वर्तमान में स्थाई रुप से झारखण्ड से है,पर जन्म बिहार राज्य में हुआ है। २ अक्टूबर को संसार में आई धनबाद वासी श्रीमती देवंती देवी को हिन्दी-भोजपुरी भाषा का ज्ञान है। मैट्रिक तक शिक्षित होकर सामाजिक कार्यों में सतत सक्रिय हैं। आपने अनेक गाँवों में जाकर महिलाओं को प्रशिक्षण दिया है। दहेज प्रथा रोकने के लिए उसके विरोध में जनसंपर्क करते हुए बहुत जगह प्रौढ़ शिक्षा दी। अनेक महिलाओं को शिक्षित कर चुकी देवंती देवी को कविता,दोहा लिखना अति प्रिय है,तो गीत गाना भी अति प्रिय है

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