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महान व्यक्तित्व की नींव में थी गुरुभक्ति

सुरेन्द्र सिंह राजपूत हमसफ़र
देवास (मध्यप्रदेश)
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स्वामी विवेकानंद जयंती विशेष…..


स्वामी विवेकानंद जी के बारे में लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। जिस विचारक के नाम की किताबों से देश के अनेकों पुस्तकालय भरे पड़े हों,अनेक किताबों की दुकानें उनकी पुस्तकों से चलती हों,जिनको पढ़ने के बाद किसी और को पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती,ऐसे महापुरुष का जन्म दिन ‘युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
स्वामी विवेकानंद जी का जन्म १२ जनवरी १८६३ में बंगाली परिवार में हुआ था। स्वामी जी कायस्थ जाति में जन्मे थे। बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ था। नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से ही बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा मन में बहुत प्रबल थी। इसके लिए वे ब्रम्हसमाज में भी गए,लेकिन संतोष नहीं हुआ। पिताजी की मृत्यु हो जाने से घर का सारा भार उन पर आ पड़ा। बहुत ज्यादा ग़रीबी के बाद भी वे अतिथि सेवी थे,स्वयं भूखे रहकर अतिथियों को भोजन कराते थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की बहुत प्रशंसा सुनकर वे पहले तो उनके पास तर्क करने के विचार से ही गए थे,लेकिन परमहंस जी ने उन्हें देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है,जिसका उन्हें कई दिनों से इंतज़ार था। परमहंस जी की कृपा से उनको आत्म साक्षात्कार हुआ,और परमहंस जी के प्रमुख शिष्य बन गए। सन्यांस लेने के बाद उनका नाम विवेकानंद हुआ।
एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में लापरवाही व घृणा दिखाई और घृणा से नाक-भौंह सिकोड़ी। यह देखकर उन्हें गुस्सा आ गया और अपने उस गुरुभाई को सबक सिखाने के लिए गुरुदेव के पास की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दिखाते हुए बिस्तर के पास रखी रक्त,कफ़ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।
गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके, गुरु को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। पूरे विश्व में भारत के अनमोल आध्यात्मिक खज़ाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और अपार निष्ठा।
२५ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने गेरुआ वस्त्र पहन लिए और पैदल चलकर पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। १८९३ में शिकागो (अमेरिका) में विश्वधर्म की परिषद हो रही थी। स्वामी जी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। एक अमेरिकन प्राध्यापक के प्रयास से उन्हें थोड़ा-सा समय मिला, लेकिन स्वामी के भाषण और विचारों को सुनकर बड़े-बड़े विद्वान चकित रह गए। फिर तो अमेरिका में उनका भव्य स्वागत हुआ और भक्तों का एक बहुत बड़ा समूह बन गया। स्वामी जी का दृढ़ विश्वास था कि आध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ खोली और अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनकी शिष्यता ग्रहण की।
गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में स्वामी जी अपने परिवार की नाजुक हालत और स्वयं के भोजन की चिंता न करके गुरुजी की सेवा में संलग्न रहे। गुरुजी की मृत्य के बाद स्वामी जी ने अमेरिका, इंग्लैंड,यूरोप के साथ ही भारतीय उपमहाद्वीपों में हिन्दू दर्शन और सिद्धांतों का प्रचार प्रसार किया।
उन्होंने अनेक किताबें लिखीं। समाज और युवाओं में उत्साह का संचार कर आधुनिक भारत की उन्नति की नींव उसी समय रख दी थी। उनका कथन था कि-“उठो,जागो और तब तक नहीं रुको,जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
स्वामी जी के जीवन से जुड़े अनेक संस्मरण और कहानियां हैं जो वर्तमान पीढ़ी को उन्नति के शिखर पर पहुँचा सकती है। यदि हम अपने जीवन में सफल होकर अपना लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं,तो स्वामी विवेकानंद जी को अवश्य पढ़िए। स्वामी जी के ऐसे सैकड़ों दृष्टान्त हैं जो हमें सत्मार्ग की राह चलकर उन्नति की ओर ले जाते हैं।
उनके २ विचार महत्वपूर्ण हैं-
“अपने जीवन में जोखिम लो,यदि आप जीतते हैं तो आप नेतृत्व कर सकते हैं,यदि आप हारते हैं तो आप मार्गदर्शन कर सकते हैं।”
“एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो,और बाकी सब कुछ भूल जाओ।”
पूरे विश्व में भारत के आध्यात्म,ज्ञान और दर्शन का डंका बजाने वाले इस महापुरुष ने ४ जुलाई १९०२ को अपने प्राण त्याग दिए। उन्हें शत-शत नमन करते हुए परम् पिता परमेश्वर से प्रार्थना है कि वे फिर किसी रूप में भारत में जन्म लें।

परिचय-सुरेन्द्र सिंह राजपूत का साहित्यिक उपनाम ‘हमसफ़र’ है। २६ सितम्बर १९६४ को सीहोर (मध्यप्रदेश) में आपका जन्म हुआ है। वर्तमान में मक्सी रोड देवास (मध्यप्रदेश) स्थित आवास नगर में स्थाई रूप से बसे हुए हैं। भाषा ज्ञान हिन्दी का रखते हैं। मध्यप्रदेश के वासी श्री राजपूत की शिक्षा-बी.कॉम. एवं तकनीकी शिक्षा(आई.टी.आई.) है।कार्यक्षेत्र-शासकीय नौकरी (उज्जैन) है। सामाजिक गतिविधि में देवास में कुछ संस्थाओं में पद का निर्वहन कर रहे हैं। आप राष्ट्र चिन्तन एवं देशहित में काव्य लेखन सहित महाविद्यालय में विद्यार्थियों को सद्कार्यों के लिए प्रेरित-उत्साहित करते हैं। लेखन विधा-व्यंग्य,गीत,लेख,मुक्तक तथा लघुकथा है। १० साझा संकलनों में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है तो अनेक रचनाओं का प्रकाशन पत्र-पत्रिकाओं में भी जारी है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में अनेक साहित्य संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। इसमें मुख्य-डॉ.कविता किरण सम्मान-२०१६, ‘आगमन’ सम्मान-२०१५,स्वतंत्र सम्मान-२०१७ और साहित्य सृजन सम्मान-२०१८( नेपाल)हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्य लेखन से प्राप्त अनेक सम्मान,आकाशवाणी इन्दौर पर रचना पाठ व न्यूज़ चैनल पर प्रसारित ‘कवि दरबार’ में प्रस्तुति है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-समाज और राष्ट्र की प्रगति यानि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त,सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ एवं कवि गोपालदास ‘नीरज’ हैं। प्रेरणा पुंज-सर्वप्रथम माँ वीणा वादिनी की कृपा और डॉ.कविता किरण,शशिकान्त यादव सहित अनेक क़लमकार हैं। विशेषज्ञता-सरल,सहज राष्ट्र के लिए समर्पित और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिये जुनूनी हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
“माँ और मातृभूमि स्वर्ग से बढ़कर होती है,हमें अपनी मातृभाषा हिन्दी और मातृभूमि भारत के लिए तन-मन-धन से सपर्पित रहना चाहिए।”