दिल्ली।
यदि साहित्य में महिलाएं न होतीं, तो साहित्य में नए विषय और मौलिक संवेदनाएं नहीं आ पातीं। महिला लेखन के कारण ही साहित्य को नए आयाम मिले हैं। सोशल मीडिया ने आज महिलाओं को अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का एक समान और सशक्त मंच प्रदान किया है। स्थायित्व, स्थानांतरण तथा भविष्य की चिंता जैसे विषय स्त्री लेखन के प्रमुख बिंदु बनकर उभरे हैं।
ख्यातिप्राप्त लेखिका दिव्या माथुर ने बतौर मुख्य अतिथि यह बात ‘समकालीन व्यंग्य समूह’ की प्रतिष्ठित पाठ श्रृंखला ‘सबद निरंतर’ के अंतर्गत हिंदी दिवस पर ‘हिन्दी साहित्य में स्त्री लेखन’ विषय पर हुई वैचारिक आभासी संगोष्ठी में कही। इसमें देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, आलोचकों और विचारकों ने साहित्य सृजन में महिलाओं के ऐतिहासिक योगदान, वर्तमान चुनौतियों और उनकी सशक्त मुखर अभिव्यक्ति पर मंथन किया। हिंदी अकादमी दिल्ली के उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा ने कहा, कि स्त्री लेखन का मूल आधार संवेदना है। निज अनुभव पर लिखे गए स्त्री लेखन की यात्रा बहुत लंबी है। वैविध्य के धरातल पर अभिव्यक्त होती स्त्री पीड़ा के बहुत मायने हैं, जो एक नये स्वर में प्रकट हो रहे हैं।
आकाशवाणी दिल्ली के सहायक निदेशक राम अवतार बैरवा ने रेखांकित किया कि स्त्री लेखन की यात्रा बहुत लंबी है। गांव की महिलाएं लोक साहित्य की अच्छी रचयिता रही हैं और लोक साहित्य का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं द्वारा ही रचा गया है। समय बदल चुका है और आज के दौर में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं भी अपनी बात और संवेदनाओं को पूरी बेबाकी के साथ अभिव्यक्त कर रही हैं।
प्रसिद्ध पत्रिका ‘अट्टहास’ के संपादक रामकिशोर उपाध्याय ने मीरा से लेकर आधुनिक काल तक की स्त्री लेखन पर चर्चा करते हुए कहा कि मीराबाई ने अपने साहित्य में अपनी पीड़ा और आंतरिक संघर्ष को खुलकर व्यक्त किया। आधुनिक काल में महादेवी वर्मा ने महिला विषयों पर मुखर होकर लिखना आरंभ किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामाजिक परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आया है, जिसके चलते महिलाओं ने समाज की हर परिस्थिति पर खुलकर लिखना शुरू किया है।
वरिष्ठ व्यंग्यकार सुभाष चंदर ने विविध विधाओं में महिलाओं के उत्कृष्ट दखल की चर्चा करते हुए कहा कि आज महिलाएं केवल कविताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे आत्मकथाएं, संस्मरण, उपन्यास और बेहतरीन कहानियां लिख रही हैं। विशेष रूप से व्यंग्य विधा में महिलाओं ने शानदार दखल दिया है।
संयोजन रामस्वरूप दीक्षित तथा आरती शर्मा द्वारा किया गया। डॉ. उपासना दीक्षित ने संचालन किया।