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माँ की पुकार

डोली शाह
हैलाकंदी (असम)
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माँ बिन…!

रहते जब बच्चे नन्हें हमारे,
रखते गोद में सहला कर
पुचकार कर थे बचाते,
उन्हें हर मुश्किल-दीवारों से।

हुए थोड़े जब बड़े,
चलना सिखाया उंगली पकड़कर
गिरते-उठते हुए संभलते,
आज बने मानो कुछ अविचल वे।

जब मिला जीवन के संघर्षों में,
कुछ नया कुछ पुराना-सा
लगता सब-कुछ है अजूबा,
आती परिस्थितियों की होड़ वहां
है कैसे करें चुनाव हम,
है क्या गलत, है क्या सही ?

कुछ जाता वक्त का समंदर आगे,
बिछड़ जाते हम अपनों से
रह जाते हम तन्हा यूँ,
संजोए दिलों में यादों की हसीन लहरें।

वक्त की इस भीड़ में,
चुरा लेते हैं वह कुछ पल यूँ
बिछड़े यारों से मिलने में,
निकल जाता है मानो
वक्त के कुछ पर हों ऐसे।

वक्त बहता हवाओं से तीव्र,
मिलने की खुशी होती नहीं पूरी
आ जाता बिछड़ने का दिन,
है वक्त का तकाजा कैसा ये।

रख लेते दिल पर पत्थर यूँ,
ना दिखाते उस दिल की आह को
जिसे आँचचल में छिपाया यूँ,
एक आह से उफ कर देते हम
आज जहां की इस होड़ में,
भेज देते यूँ, संभाल ले अपनी तू
सँवार ले तू अपनी जिंदगी
सजा ले तू अपनी राह फूलों से।

बिस्तर की काँटों की सेज पर हम,
बिता लेंगे हम कुछ यह दिन कुछ पल ये
रखना संभाले यादें हमारी,
है गुजारिश नन्हीं हमारी।
सँवार ले तू अपनी राह फूलों से,
सँवार ले तू अपनी राह फूलों से॥

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