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माँ बिन तम

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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माँ बिन…!

माँ ही है गुरु
उजाला जीवन का
सबसे शुरू।

माँ अनुपम
बेफिक्र दुनिया से
सहती गम।

होती जननी,
माँ बिन क्या जगत
माँ ही धरणी।

माता महान
जलती दीपक-सी
माँ है विज्ञान।

कभी ना हारे
माँ बिन अंधकार
बच्चे दुलारे।

माँ तेरी गोद,
पाया पूरा संसार
अखंड शांति।

ममता मूर्ति
हर खजाना पल्लू
माँ करे पूर्ति।

माँ है ईश्वर
परिवार की धुरी
करे दुलार।

माँ बिन तम
देती सदा सम्बल
माँ से ही हम।

कष्ट सहे माँ
है महिमा अपार
चुप रहे माँ ।

माँ समन्दर
हर पल दे दुआ
माँ कलन्दर।

चुकाओ कर्ज
सेवा करो अपार
निभाओ फर्ज़।

माँ देती प्राण
नहीं बस जननी
पीड़ा में छाँव।

उर विशाल
अलग प्रेम है माँ
घर का भाल।

माँ ही सृष्टि
बगिया-सा जीवन
दे प्रेम वृष्टि।

रिश्ता अमोल
जोड़ त्याग-दया का
समझो मोल ।

जग बदले
बदले हर कोई
ना बदले मां।

अस्तित्व मेरा
माँ बिन सूना घर
कर्ज़ है तेरा।

गुणों की खान
जीवन दिया माँ ने
है अहसान।

सिखाती ज्ञान
देती खजाना लुटा
माँ देश मान।

माँ है सहारा
सारे रिश्ते हैं बौने
माँ हो किनारा।

माँ अहसास
दवा बनती दुआ
रखो विश्वास।

माँ है गुरूर,
लड़ जाती ईश्वर से
बचाती जान।

‘माँ’ शब्द नहीं
उऋण नहीं ऋण
प्रेम मिठास।

सम्पूर्ण जग
माँ सम्वेदना, शक्ति
लहू है रग।

पहला रिश्ता
जन्म अपार कष्ट
है माँ का हिस्सा।

रोम-रोम माँ
समन्दर प्रेम का
तारे आशीष।

पा लो आशीष
मिले ना सहज माँ
निभाओ धर्म॥

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