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मातृत्व से वंचित

ओमप्रकाश अत्रि
सीतापुर(उत्तरप्रदेश)
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विश्व बाल दिवस स्पर्धा विशेष………..

खिलते हैं
उरोज
अब कुसुम जैसे,
जो
मोह लेते,
बड़े-बड़े
सप्तर्षियों को।
शुक-सा
बन्द है
पिंजड़े में,
सप्ला पुष्प की तरह
खिलकर रात में।
मधु,
पराग रहित
सुरभि को बढ़ाता है,
बस
कंचुकी आड़ में
छिपा है
स्वर्गिक सुख लिए।
डरती हैं
सुन्दरियाँ,
अपने लालों को
कुचों से लगाने में,
कहीं
सूख न जाएं
दोनों
पद्म पराग
दुग्ध पान कराने में।
कहीं
धूमिल न पड़ जाए
रूप की छठा,
इसी लिए
मुकरती हैं,
उसे
छाती से लगाने में।
डिब्बों,
बकरियों
गाय-भैंसों का
दूध वे पिलाती हैं,
पर
शर्माती हैं,
मातृत्व की
ममता लुटाने में।
कैसे!
विमुख
हो न जाए
माँ के दूध की
शपथ से कोई बच्चा,
जब
चखा ही नहीं
कभी,
माँ के आँचल के
दूध का स्वाद ?
कैसे!
भिड़ जाए
माँ के
दूध की आन पर,
जब
कभी,
माँ ने
बच्चे के लिए
खोला ही नहीं,
कंचुकपटों का द्वार ?
कहती हैं-
नहीं
उतरता है दूध,
अरे!
कैसे उतरेगा
जब
रखती हैं,
बच्चे को
अपने सीने से दूर ?
बड़ा
अदभुत है,
आज की
माताओं का खेल,
जो
जीते जी
झोंक देती
अपने जाए को
काल के गाल में।
बड़ा
अजीब है,
जो
जन्म देने में
हिचकती नहीं हैं,
पर
बच्चे को,
उसके
हक से
दूर रखकर
सुन्दरता दिखाती हैं॥

परिचय-ओमप्रकाश का साहित्यिक उपनाम-अत्रि है। १ मई १९९३ को गुलालपुरवा में जन्मे हैं। वर्तमान में पश्चिम बंगाल स्थित विश्व भारती शान्ति निकेतन में रहते हैं,जबकि स्थाई पता-गुलालपुरवा,जिला सीतापुर है। आपको हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी सहित अवधी,ब्रज,खड़ी बोली,भोजपुरी भाषा का ज्ञान है। उत्तर प्रदेश से नाता रखने वाले ओमप्रकाश जी की पूर्ण शिक्षा-बी.ए.(हिन्दी प्रतिष्ठा) और एम.ए.(हिन्दी)है। इनका कार्यक्षेत्र-शोध छात्र और पश्चिम बंगाल है। सामाजिक गतिविधि में आप किसान-मजदूर के जीवन संघर्ष का चित्रण करते हैं। लेखन विधा-कविता,कहानी,नाटक, लेख तथा पुस्तक समीक्षा है। कुछ समाचार-पत्र में आपकी रचनाएं छ्पी हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-शोध छात्र होना ही है। अत्रि की लेखनी का उद्देश्य-साहित्य के विकास को आगे बढ़ाना और सामाजिक समस्याओं से लोगों को रूबरू कराना है। इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक-रामधारीसिंह ‘दिनकर’ सहित नागार्जुन और मुंशी प्रेमचंद हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज- नागार्जुन हैं। विशेषज्ञता-कविता, कहानी,नाटक लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-
“भारत की भाषाओंं में है 
अस्तित्व जमाए हिन्दी,
हिन्दी हिन्दुस्तान की न्यारी
सब भाषा से प्यारी हिन्दी।”

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