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मानव-धर्म आबाद रहे…

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’
बूंदी (राजस्थान)
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अब तो कर दो प्रभुजी किरपा,
मानव-धर्म को सजा सकूँ
धर्म कभी ना कट्टर होवे,
मानव-मानव से बचा सकूँ।

पीड़ित भी हूँ, कुंठित भी हूँ,
मन भी मेरा सुलग रहा
मानव-मानव को, क्षत-विक्षत करके,
मन ही मन क्यों पुलक रहा ?
उनको तुम सद्बुद्धि देना,
‘विष’ को मैं भी पचा सकूँ।
अब तो कर दो प्रभुजी किरपा…

जग-जीवन यह जंगल जैसा,
डर मानव से डरा हुआ
आतंक-आग से जले मानवता,
उनका मन क्यों मरा हुआ ?
‘अजस्र’ वो शक्ति मुझको दे दो,
सोए जमीरों को जगा सकूँ।
अब तो कर दो प्रभुजी किरपा…

आग जो दी तुमने, मेरे हृदय में,
बुझे दीपकों को,जला सकूँ
मन को ही ना मैं, दाहक कर लूँ,
जग विस्फोट से बचा सकूँ।
‘सारथी’ मेरे, तुम बन जाओ,
‘ग़दर’ तो मैं भी मचा सकूँ।
अब तो कर दो प्रभुजी किरपा…

धर्म-सनातन, शुद्र घर जन्मा,
छूत-अछूत में भरमाया
जो गुणों, पांडित्य भी पाकर,
क्यों ‘दलित’ दर्जा पाया ?
मन से दबे, मन-कुचलों को मालिक,
विश्वास तुम्हारा बंधा सकूँ।
अब तो कर दो प्रभुजी किरपा…

रची थी तुमने, जो वो सृष्टि,
रंग विकृत क्यों आज हुए ?
जिस धरती, खुशियों हरियाली,
उसके रंग क्यों लाल हुए ?
रंग कल्पना ‘अजस्र’ ही भर कर,
आनंद-रंग को मैं जमा सकूँ।
अब तो कर दो प्रभुजी किरपा…
मानव-धर्म को सजा सकूँ।
धर्म कभी ना कट्टर होवे,
मानव-मानव से बचा सकूँ॥

परिचय–आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार ‘अजस्र’ के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि १७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान बूंदी (राजस्थान) है। आप बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान आदि मिले हैं।

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