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मिलते नहीं अब इंसान

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड) 
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मैं निकला घर की खोज में,
अनजान राहों से एक रोज मैं
जाते-जाते कई मकान मिले,
मिला नहीं घर किसी रोज में।

मैंने एक दरवाजा खटखटाया,
फिर एक पुरूष आकर फरमाया
किस जाति के हो! हमें बताओ,
अन्यथा तुम आगे कदम बढ़ाओ।

मैंने कहा,- मैं हूँ एक आम इंसान,
बस इतनी ही है मेरी पहचान
पहचान जान दरवाजा बंद किया,
मैं भी आगे बढ़ मन को समझाया।

बढ़ते-बढ़ते मिला एक महल,
महल देख मन गया मेरा मचल
सोंचा इसमें बसता होगा इंसान,
बैठकर इस घर लगाऊँगा ध्यान।

अब द्वार की घंटी बजा मैं हर्षाया,
एक स्त्री आ बोली धर्मशाला बनाई
वहीं पर बैठ तुम ध्यान लगाओ,
दोबारा द्वार की घंटी ना बजाओ।

समझ गया अब घर, घर न रहा,
बन गया ईंट-पत्थर का सामान
यहाँ पर रहते हैं केवल मनुष्य,
मिलते नहीं कहीं अब इंसान।

फिर देखा मैंने उस रामलाल को,
अपने लाल में भूला पिता का लाल
प्यारी लगती उसे अब अपनी बेटी,
पिता की बेटी लगती है अब खोटी।

हर्षाया हरदम संग पा पिता का सहारा,
आज कोने में पड़ा है एकांत बेचारा
सत्य है आज जो बीज हम बोएंगे,
उसी का फल भविष्य में हम खाएंगे।

समझा मानव तरक्की करने लगा है,
संस्कार अपने पीछे छोड़ने लगा है।
कहता ‘राजू’ लगाओ तथ्य पर ध्यान,
देखो कहीं मिलते नहीं अब इंसान॥

परिचय– साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव- लोहापिटटी में हैL जन्मतारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद हैL भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन(डिप्लोमा)की शिक्षा प्राप्त की हैL साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल हैL आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी(विद्यालय में शिक्षक) हैL सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैंL लेखन विधा-कविता एवं लेख हैL इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना हैL पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैंL विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।