मुझको गले लगा लेना

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शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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निर्झर से बहते मन भावों को
जब भी रोक न पाओ तुम,
डर कर मन के तम से ही जब
खुद से ही घबरा जाओ तुम,
आँखें सपनीली बरस पड़े या
चैन कहीं नहीं पाओ तुम,
यादों के सपन सजा कर के
जब उनमें ही खो जाओ तुम,
तब मुझे बसा कर आँखों में
दिल को अपने समझा लेना,
या बाँह पसारे आकर के बस
मुझको गले लगा लेना।

घन गरजेंगे काले-काले
बिजली जब चमक डराएगी,
बारिश की बूंदें भी आकर के
दिल में आग लगाएंगी,
सखियाँ जब मारेंगी ताने
मन को कैसे समझाओगी,
कर-करके याद मुझे ‌बैठी
तुम बस आँसू ढलकाओगी,
तब क़ासिद के हाथों से तुम
चिट्ठी मुझको भिजवा देना,
या बाँह पसारे आकर के बस
मुझको गले लगा लेना।

दिल में तुम हरदम रहती हो
मैं तुमको भूल न पाता हूँ,
तुमसे कब मिल पाऊँगा मैं
उन सपनों में खो जाता हूँ,
खुलते ही आँखें अपने को
जब मैं बिस्तर में पाता हूँ,
क्या करूँ नौकरी करनी है
मैं विवश जरा हो जाता हूँ,
अबकी निश्चित ही आऊँगा
मन को अपने समझा लेना।
या बाँह पसारे आकर के बस,
मुझको गले लगा लेना॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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