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मेरा अस्तित्व

तारा प्रजापत ‘प्रीत’
रातानाड़ा(राजस्थान) 
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आज क्या ?
कभी भी तुमने,
मेरे अस्तित्व को
स्वीकार ही,
नहीं किया।

हमेशा हुक़ूमत
चलाई अपनी,
मेरी भावनाओं को
समझने का,
रत्तीभर भी
प्रयास नहीं किया,
कभी तुमने।

एक मोहरे की तरह
खेलते रहे,
मेरी सम्वेदनाओं के साथ
मेरे बहते आँसुओं को,
दिखावा कह कर
झुठलाते रहे।

मेरी चुप्पी को
समझ कर,
मेरी कमज़ोरी
हावी होते गए,
तुम मुझ पर।

मेरी हर बात
तुम्हें बेतुकी लगी,
मेरी हर सलाह
बेवज़ह लगी,
कभी ऐतबार ही
नहीं किया,
तुमने मुझ पर।

रुक गए आकर
मेरे ज़िस्म पर,
मेरी रूह तक तो
तुम कभी,
पहुँचे ही नहीं।

एक बार तो
टटोला होता,
मेरा अंतर्मन
एक कोशिश तो की होती,
मुझे समझने की
तो तुम समझ जाते।
मैं क्या हूँ ?
मैं कौन हूँ…?

परिचय– श्रीमती तारा प्रजापत का उपनाम ‘प्रीत’ है।आपका नाता राज्य राजस्थान के जोधपुर स्थित रातानाड़ा स्थित गायत्री विहार से है। जन्मतिथि १ जून १९५७ और जन्म स्थान-बीकानेर (राज.) ही है। स्नातक(बी.ए.) तक शिक्षित प्रीत का कार्यक्षेत्र-गृहस्थी है। कई पत्रिकाओं और दो पुस्तकों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं,तो अन्य माध्यमों में भी प्रसारित हैं। आपके लेखन का उद्देश्य पसंद का आम करना है। लेखन विधा में कविता,हाइकु,मुक्तक,ग़ज़ल रचती हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण होना है।

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