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मेरा गाँव

डॉ. वंदना मिश्र ‘मोहिनी’
इन्दौर(मध्यप्रदेश)
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वो सकरी पगडंडी,कच्ची-सी मेड़,
छोटे-छोटे खट्टे-मीठे बेरी के पेड़
पुराना बूढ़ा बरगद,पीपल का पेड़,
पलाश पर दहकते लाल-लाल फूल।
ऐसा था मेरा गाँव…

वो बल खाती कच्ची,ऊबड़-खाबड़,
पगडंडियों से गुजरा,मेरा बचपन
वो खेत की मड़िया,पुरानी सी खाट,
पिता के हाथों में,कलेवे का डब्बा
वो डूबता धूल भरा,गुनगुनाता दिन,
सावन की भीगती साँझ
वो खेत,खलिहान,
ऐसी थी मेरी बचपन की शान
घरों से उठता धुँआ,
वो चूल्हे की धधकती की आग
वो माँ की आवाज,
वो सब भाई-बहनों का साथ
मेरी गाँव की,
वो बेपरवाह सी जिंदगी।
ऐसा था मेरा गाँव…

आज इस मैट्रो शहर की घुटन में,
बीतते हुए यह पल
मेरे गाँव के उन कीमतों पलों से
प्रतिस्पर्धा करते नजर आते हैं,
तभी सामने लगा पीपल का पेड़
हवा में झूम कर,
उसे पराजित कर देता है
मानो कहीं दूर लगे,
अपने बरगद दादा को याद कर रहा हो
और मैं इस गैलरी में बैठी,
अपने गाँव की गलियों में घूम आती हूँ।
मन कह उठता है…
ऐसा था मेरा गाँव॥

परिचय-डॉ. वंदना मिश्र का वर्तमान और स्थाई निवास मध्यप्रदेश के साहित्यिक जिले इन्दौर में है। उपनाम ‘मोहिनी’ से लेखन में सक्रिय डॉ. मिश्र की जन्म तारीख ४ अक्टूबर १९७२ और जन्म स्थान-भोपाल है। हिंदी का भाषा ज्ञान रखने वाली डॉ. मिश्र ने एम.ए. (हिन्दी),एम.फिल.(हिन्दी)व एम.एड.सहित पी-एच.डी. की शिक्षा ली है। आपका कार्य क्षेत्र-शिक्षण(नौकरी)है। लेखन विधा-कविता, लघुकथा और लेख है। आपकी रचनाओं का प्रकाशन कुछ पत्रिकाओं ओर समाचार पत्र में हुआ है। इनको ‘श्रेष्ठ शिक्षक’ सम्मान मिला है। आप ब्लॉग पर भी लिखती हैं। लेखनी का उद्देश्य-समाज की वर्तमान पृष्ठभूमि पर लिखना और समझना है। अम्रता प्रीतम को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाली ‘मोहिनी’ के प्रेरणापुंज-कृष्ण हैं। आपकी विशेषज्ञता-दूसरों को मदद करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिन्दी की पताका पूरे विश्व में लहराए।” डॉ. मिश्र का जीवन लक्ष्य-अच्छी पुस्तकें लिखना है।

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