संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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हमारा भविष्य, ताकत और प्रेरणा (विश्व माता-पिता दिवस विशेष)…
माँ की लोरी में नींद है,
पिता की डाँट में प्यार है
मेरे सारे सवालों का,
बस यही संसार है।
न मंदिर गया कभी,
न मस्जिद गया कभी
न गुरुद्वारे में मत्था टेका कभी,
न कोई तीर्थ पर गया कभी
जिस आँगन में वो हैं,
बस वही मेरा खुदा बसा है।
माँ ने भूखी रहकर मुझे,
पेट भरकर निवाला खिलाया
पिता ने अपना सपना,
मेरे नाम पर लुटाया
जूते फटे उनके,
पर मुझे नया दिलाया
मैं थक गया तो,
कंधे पर मुझको बिठाया।
गिरा था जब मैं,
माँ ने हाथ थामा था
लड़खड़ाया जब मैं,
पिता ने हौसला दिया था
हर बात में आगे बढ़ने का हौसला भी,
उन्हीं की परवरिश और संस्कार से मिला।
आज दुनिया में इज्जत है,
तो बस उनकी वजह से
माथा ऊँचा है तो,
बस उनके आशीर्वाद से
एक बार झुका दूँ,
अगर उनका सर
तो समझो सारी,
पूजा मेरी व्यर्थ है।
मेरा तो बस इतना कहना है उनसे,
माँ, तू मेरी दुआ है
पिता, तू मेरी दवा है,
तुम दोनों हो तो मेरा,
हर दिन ‘मातृ-पितृ दिवस’ है।
क्योंकि तुमने ही मेहनत से,
मुझे ‘इंसान’ बनाया है॥