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मौन रहकर भी…

डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
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आधुनिक मीरा ‘महादेवी वर्मा’ (पुण्यतिथि विशेष)…

मौन रहकर भी जिसने क्रांति का शंखनाद किया,
हर बंधन को तोड़कर नवयुग का आगाज़ किया
बन वियोगिनी राधिका-सी पीड़ा पर अभिमान किया,
नारी-अस्मिता का भव्य, अनूठा श्रृंगार किया।

तुमने तो अपनी पीड़ा को करुणा का वरदान दिया,
अक्षरों के मर्मस्थल को स्नेहिल सात्विक ज्ञान दिया
गुलमोहर की छाँव तले वह विरह का संवाद कहाँ ?
‘यामा’ की सूनी रातों में, अब वह सुमधुर नाद कहाँ ?
नीरव संध्या की चादर पर अब भी पदचाप तुम्हारी है,
तू विरहधारिणी, करुणास्वामिनी मीरा की अनुगामिनी है।

तुमने सिखाया था जग में आँसू को मोती करना,
मंदिर में सूने पथ पर दीपों-सा नीरव जलना
अंधकार के विरह पथ पर बाट जोहती प्रियतम की,
जो तुम आ जाते एक बार, बार-बार कर जोड़ती।

शब्द-साधना की अगोचर छाँव से जग भर गई,
सांध्य बेला में उतरती चाँदनी बन बिखर गई
साँझ ढले जब दीपशिखा सा प्राण अकेला जल जाता,
‘यामा’ का हर एक पन्ना चंदन-सा महक जाता।

विरह व्यथा की हर गाथा को शूल-फूल बन मुस्कुराई,
श्रृंखला की तोड़ कड़ियों को, बदली बन अम्बर में छाई।
पुण्यतिथि पर आज झुकता, शीश उनके ध्यान में,
गूँजती है आज भी कविता, उसी आवाज़ में॥