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हिंदुस्तान में हिंदी

शीला बड़ोदिया ‘शीलू’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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जन मन का भाव हिन्दी (हिन्दी दिवस विशेष)…

हमारे देश के विभिन्न राज्य में भिन्न-भिन्न भाषाएं बोली जाती है, जैसे गुजरात में गुजराती, राजस्थान में मारवाड़ी, पंजाब में पंजाबी, महाराष्ट्र में मराठी, दक्षिण भारत में तेलुगू, मलयालम, कन्नड़, पूर्वोत्तर भारत में असमिया, बोडो, मणिपुरी, बंगाली आदि भाषाएं बोली जाती है। सांस्कृतिक विभिन्नताओं से भरे इस देश में भाषा की एकरूपता लाना बहुत कठिन था। इसलिए, संवैधानिक तौर पर हिंदी को ‘राजभाषा’ का दर्जा दिया गया, ताकि पूरे देश में प्रशासनिक कार्य  सुचारू रूप से हो सके। इसलिए मातृभाषा के साथ-साथ प्राथमिक विद्यालयों में हिंदी भाषा भी शामिल की गई, ताकि हर राज्य की विभिन्न भाषा बोलने वाले बच्चे शुरू से ही मातृभाषा के साथ हिंदी सीखने का प्रयास करें, और भविष्य में वह अपनी भावनाएं एक-दूसरे के साथ व्यक्त कर सके। जब तक हम एक- दूसरे की भाषा नहीं जानते, तब तक २ व्यक्ति अपनी भावना या संदेश एक-दूसरे को नहीं समझा सकते, क्योंकि भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। हिंदी भाषा, जो हमारे देश में अधिकांशत: लोग जानते हैं, सुनते और समझते हैं। भारत देश के लोगों के मध्य विचार, भाव अभिव्यक्ति एवं संदेश संप्रेषण का सहज माध्यम है।
      हिंदी भाषा सरल, सहज है, लेकिन वर्तमान समय में लोग भाषा के प्रति क्षेत्र विशेष में गलत भावना रखने लगे हैं। जैसे महाराष्ट्र में हिंदी भाषा या अन्य भाषा के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है। उन्हें जबरदस्ती मराठी भाषा बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो ठीक नहीं है। यदि इसी प्रकार हर भाषा-प्रांत के लोग अपनी भाषा के लिए उग्र भावना रखकर जबरदस्ती अपनी भाषा बोलने का विचार दूसरी भाषा वाले व्यक्ति पर थोपने लगेंगे, तो भारत जैसे महान देश में असमानता और अराजकता का माहौल पैदा हो जाएगा, जो देश की अखंडता और एकता के लिए खतरा है।
    विभिन्न भाषा बोले जाने वाले हमारे देश में राजभाषा हिंदी के सामने एक चुनौती तो है, लेकिन हिन्दी एक बड़े स्तर पर बोली जाने वाली और समझे जाने वाली भाषा है। इसके बिना शायद देश में काम ना चल सके ,क्योंकि दूसरी राजभाषा अंग्रेजी है, जिसे इतने बड़े स्तर पर लोग सुनते, समझते नहीं है, जितना की हिंदी को पढ़ने और समझने वाले लोग हैं। सबको राजभाषा का सम्मान करना चाहिए और व्यापक प्रचार-प्रसार में यदि सहयोग न कर सके, तो भाषा को लेकर विवाद की स्थिति खड़ी नहीं करना चाहिए, क्योंकि हिंदी भाषा हमारी भारतीयता की पहचान है-
हिंदुस्तान में हिंदी
सरल मन के विचार
मानव के आचार है हिंदी।

विभाव के भाव तो
हिंदुस्तानियों का स्वभाव है हिंदी।

विह्वलता में सरलता,
अभिव्यक्ति है हिंदी।

नीरसता में सरसता तो,
साहित्य का प्राण है हिंदी।

सुकोमल मन को छूती,
विषाद में हर्ष है हिंदी।

अचेतन मन की चेतनता तो,
मन में बहती गंगा है हिंदी।

काल का विभाजन तो,
ऋतुओं का वर्णन है हिंदी।

समय चक्र का चलना तो,

सालों का इतिहास है हिंदी।

सभी भारतीय में बसा तो,
हृदय का स्पंदन है हिंदी।

भारत में बसे भारतीयों का,
गरिमामय हिंदुस्तान है हिंदी॥

परिचय-शीला बड़ोदिया का साहित्यिक उपनाम ‘शीलू’ और निवास इंदौर (मप्र) में है। संसार में १ सितम्बर को आई शीला बड़ोदिया का जन्म स्थान इंदौर ही है। वर्तमान में स्थाई रूप से खंडवा रोड पर ही बसी हुई शीलू को हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा का  ज्ञान है, जबकि बी.एस-सी., एम.ए., डी.एड. और बी.एड. शिक्षित हैं।  शिक्षक के रूप में कार्यरत होकर आप सामाजिक गतिविधि में बालिका  शिक्षा, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी को समझाओ अभियान, पेड़ बचाओ अभियान एवं रोजगार उन्मुख कार्यक्रम में सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, संस्मरण, गीत और जीवनी है। प्रकाशन के रूप में काव्य संग्रह (मेरी इक्यावन  कविता) तथा १५ साझा संकलन में रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी को स्थान मिला है। इनको मिले सम्मान व पुरस्कार में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड सम्मान (साझा संकलन), विश्व संवाद केंद्र मालवा (मध्य प्रदेश) द्वारा सम्मान, कला स्तम्भ मध्य प्रदेश द्वारा सम्मान, भारत श्रीलंका सम्मिलित साहित्य सम्मान और अखिल भारतीय हिन्दी सेवा समिति द्वारा प्रदत्त सम्मान आदि हैं। शीलू की विशेष उपलब्धि गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में रचना का शामिल होना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य में उत्कृष्ट लेखन का प्रयास है। मुन्शी प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास, सूरदास, अमृता प्रीतम इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज गुरु हैं। इनका जीवन लक्ष्य-हिन्दी साहित्य में कार्य व समाजसेवा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिन्दी हमारी रग-रग में बसी है।”