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यदि तुम ना होती…

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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पृथ्वी दिवस विशेष…

प्यारी धरा!
यदि तुम ना होती,
सिन्धु ना होता, सृष्टि ना होती
जीवन ना होता, वृष्टि ना होती।
प्यारी धरा!
यदि तुम ना होती…॥

ना ही गाँव, ना पनघट होता,
ना शहरों का प्रदूषण होता
खेत और खलिहानों में,
बगीचों में-पहाड़ों में
धानी चुनर प्रकृति ना ओढ़ती।
न्यारी धरा!
यदि तुम ना होती..॥

वसुधा बिना बीज न होता,
हरियाली का काम ना होता
शीतल छाँव का नाम ना होता,
भंवरे की गुंजन ना होती
सावन की बूंदें भी रोतीं।
सुकुमारी धरा!
यदि तुम ना होती…॥

धरती माँ है तो है जीवन,
माँ के बिना रुदन ही रुदन
यह सारा ब्रह्मांड ना होता,
गर पंचतत्व में धरा न होती
न होती मही, न कल्पना होती।
हितकारी धरा!
यदि तुम ना होती…॥

जलचर थलचर कोई ना होते,
तुम ना होते, हम भी ना होते
जगती का निर्माण ना होता,
प्रणय-वेदना कुछ ना होती
जड़, चेतन, सुगंध ना होती।
परोपकारी धरा!
यदि तुम ना होती…॥

दोहन से धरा को बचाना है,
रत्नगर्भा को मुक्त कराना है
भूमि का जीवन हमें बचाना है,
मिलकर ये सौगंध खानी है
जीवन-दात्री हमें बचानी है,
निर्मल धरा है जैसे सीप में मोती।
सुखकारी धरा!
यदि तुम ना होती…॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।

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