कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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बाजार से लाई हूँ इसको,
लाल, पीली, नीली रंग-बिरंगी पुड़िया
इससे बनेगी दरवाजे पर,
एक छोटी-सी रंग-बिरंगी रंगोली की दुनिया।
फुलझड़ियाँ और पटाखे बेच रही थी,
कोने में बैठी एक सुंदर-सी गुड़िया
मिट्टी के कुछ दीए-बाती, कुछ कुल्हड़,
मोल-भाव से ठोक-बजाकर लाई हूँ इसको।
दीया-बाती, बिजली से चमक रही है,
सबकी छत की ऊँची-ऊँची क्यारी
फुलझड़ियों संग दौड़ मचाती,
लाल रंग वाली चुनर ओढ़े बिटिया।
भोली-भाली, सुंदर सूरत वाली,
मतवाली, काली-काली आँखों वाली
घर-घर से निकली है सुंदर-सुंदर बिटिया,
देखो कैसे मुस्काती, गीत गाती नाच रही है बिटिया।
फुलझड़ियाँ हाथों में लेकर,
खुशियाँ बाँटे,
आँगन में कैसे बिटिया सुंदर सुंदर।
नए-नए कपड़े-गहनों से सजी-धजी,
खेल रही पटाखों संग मेरी प्यारी बिटिया॥