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रखें सरलता हरपल जीवन

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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मनुज आचरण वचन सरलता, आडंबर बिन प्रीत मिलन है,
टपके निश्छल निर्मल अविरल, अपनापन रिश्ते गुलशन है।

सत्य बोध हियतल अनुमोदन, काव्य भाव प्रकटित रचना है,
शाश्वत चिन्तन सुरभित कविमन, कौन पराया या अपना है।

राष्ट्र भक्ति रस ओत प्रोत मन, अर्पण तन मन देश चरण है,
बन कुसुमाकर राष्ट्र प्रगति चहुँ, मुस्कानें खुशियाँ पुष्पन है।

तज आडम्बर सहज सरल बन, सदाचार गुण अनुशासन है,
सच्चरित्र संस्कार मनोरम, मधुरिम स्नेहिल मित भाषण है।

निशिवासर रक्षित चहुँ सीमा, हर शहीद प्रति शीश नमन है,
भारत के जयकारा गुंजित, ध्वजा तिरंगा गीत भजन है।

तोड़ सकल बाधा खल दहशत, चक्रव्यूह रिपु दल भेदन है,
महाज्वाल बन यौवन सैनिक, पाक चीन अरि अनल दहन है।

साथ चलो रण पार्थ अकेला, सार्थ सुदर्शन भारत जन है,
सारे खल कामी दुश्मन मिल, गांडीव भेदन व्याकुल मन है।

राष्ट्र मान यश शान मनोरथ, धर्मयुद्ध फिर दामोदर है,
दिव्यास्त्रों से घायल पौरुष, सत्य सुदर्शन प्रेम अधर है।

माना पाप शमन दुर्भर जग, विजय गीत गायन दुष्कर है।
किन्तु साथ गणतंत्र मिले रण, मधुसूदन जय श्रेयस्कर है।

त्याग तपस्या अविरत उद्यम, मति विवेक तल सच संगम है,
मानवता नैतिक मूल्यांकन, न्याय नीति सब जन सरगम है।

परहित सेवा पौरुष सत्पथ,तभी सफल दुर्लभ जीवन है
प्राण जाए भारत माँ पद तल, आहत राहत चाहत मन है।

कलम बने ब्रह्मास्त्र वीर कवि, महाकाल बन खल रोदन है,
पांचजन्य कवि नाद शंख रण, समझ विजय रथ अनुमोदन है।

मनुज धर्म दायित्व कर्मपथ, सफल अगर जनमन गुलशन है,
भक्ति सनातन भारत बन रथ, ईश प्रेम हिय नित सिमरन है।

अपनापन भ्रातृत्व भाव मन, क्षमा शील हिय संवेदन है,
हरें उदासी खुशियाँ भर सुख, भारत जनमत एक वतन हैं।

आडंबर परमार्थ तजे जन, पौरुष दुनिया संजीवन है,
रखें सरलता हरपल जीवन, शान्ति सुखद यश सदा वतन है॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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