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राकांपा की फूट से विपक्षी एकता को झटका

ललित गर्ग
दिल्ली
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वर्ष २०२४ के चुनाव से पूर्व भारतीय राजनीति के अनेक गुणा-भाग और जोड़-तोड़ भरे दृश्य उभरेंगे, महाराष्ट्र में ताजा राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है। वहां जो हुआ है उससे विपक्ष में खलबली है, घबराहट एवं बेचैनी स्पष्ट देखी जा सकती है। जो पटकथा महाराष्ट्र में लिखी गई है, वही बिहार में भी लिखी जा सकती है। राजनीतिक दलों के भ्रष्टाचार को दबाने के लिए, सत्ताकांक्षा एवं आंतरिक असंतोष के चलते ऐसे समझौते, दलबदल एवं उल्टी गिनतियाँ अब आम बात हो गई है। कल तक सत्ता पक्ष को कोसने वाले अजित पवार अपनी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से बगावत कर उप-मुख्यमंत्री बन गए हैं। राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले शरद पवार की पार्टी का यह हश्र आश्चर्यकारी ही नहीं, बल्कि एक बड़ा विरोधाभास एवं विपक्षी एकता का संकट भी है। एक तरफ इस तरह के घटनाक्रम को दलों में आंतरिक असंतोष व गुटबाजी से जोड़ा जा सकता है तो दूसरी तरफ सत्ता के उस स्वाद की आकांक्षा से भी, जिसे हर कोई पाना चाहता है। दलों में बगावत का ऐसा दौर जब भी होता है, इस बात को जोर-शोर से प्रचारित किया जाता है कि उनके दल में लोकतंत्र नहीं रहा इसलिए वे अपने विरोधियों से हाथ मिला रहे हैं। बड़ा प्रश्न है कि, इस तरह दलों से लोकतंत्र गायब हो रहा है, तो ऐसे अलोकतांत्रिक दल कैसे देश के लोकतंत्र को हांक सकेंगे ?
आजकल राजनीति में उल्टी गिनती एक ‘सूचक’ बन गई है, “किसी महत्वपूर्ण राजनीतिक ऊटापटक या घटनाक्रम की शुरूआत के लिए।” विभिन्न दलों में ऐसी कई उल्टी गिनतियाँ चल रही हैं। कई कद्दावर नेताओं के सार्वजनिक-भावी जीवन की उल्टी गिनतियाँ चल रही हैं। करोड़ों-अरबों के घोटाले और रोज कोई न कोई उसमें और पलीता लगाने वालों के नाम जुड़ रहे हैं। इन पर ईडी, सीबीआई, आयकर की कार्रवाई की गिनती शुरू है। किसी की भी हालत ठीक नहीं है। ये उल्टी गिनतियाँ परिचायक हैं कोई नया पर्दा उठने की। अबकी बार कितनी दूर जाएगी-यह गिनती, पूरी होने पर ही मालूम होगा, पर कांप अभी से कई नेता रहे हैं। इसीलिए ऐसे बे-मेल गठबंधन एवं उठा-पटक देखने को मिल रही है। आम चुनाव आने तक ऐसे तरह-तरह के परिदृश्य उभरेंगे। ऐसे में देखना होगा कि जांच एजेंसियाँ इन नेताओं के कथित भ्रष्टाचार के मामलों में आगे क्या करती हैं। बहरहाल, दलबदल भले ही महाराष्ट्र में हुआ हो, इसकी सबसे बड़ी चोट राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता पर पड़ी है। शरद पवार विपक्ष के सबसे कद्दावर नेताओं में हैं और विपक्षी एकता के प्रयासों में अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में उनके पैरों के नीचे से उनकी लगभग पूरी पार्टी को खींच कर भाजपा ने यह संदेश दिया है कि विपक्षी नेता जो भी दावे करें, उनकी पार्टी ही उनके काबू में नहीं है। यह बहुत बड़ा संदेश है, जिसका जबाव तलाशना भी विपक्षी दलों के लिए जरूरी है।
भाजपा एक सक्षम एवं ताकतवर दल है, नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह करिश्माई राजनेता हैं, अनेक विशेषताओं वाले इन दोनों नेताओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि ये अपने साथ दगा करने, धोखा देने या विश्वासघात करने वालों को कभी माफ नहीं करते। मौका आने पर ये ऐसे लोगों को सबक जरूर सिखाते हैं, महाराष्ट्र में सियासी उठापटक ऐसा ही सबक है। चुनाव पूर्व गठबंधन को नकारते हुए २०१९ में शिवसेना ने अपने सहयोगी दल भाजपा से संबंध तोड़ जिस तरह सरकार बनाई और उसके जबाव में बाद में भाजपा ने जो दांव खेला, किसी से छिपा नहीं नहीं है। विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष रहे अमित शाह को चुनाव परिणाम बाद उद्धव ठाकरे ने धोखा दे दिया था। इसी कारण एकनाथ शिंदे शिवसेना से बगावत कर सीएम बनने में कामयाब हुए। दरअसल, महाराष्ट्र में राकांपा के साथ जो कुछ भी हुआ उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि शरद पवार चुनाव परिणाम के बाद भाजपा के साथ सरकार बनाने को राजी होकर भी पलटी मार ली थी।
ताजा घटनाक्रम राजनीतिक जोड़-तोड़ के माहिर खिलाड़ी रहे राकांपा प्रमुख शरद पवार के लिए निश्चित ही बड़ी राजनीतिक मात साबित हुई है। ऐसे वक्त में जब समूचे भारतीय राजनीति में पवार खुद विपक्षी एकता के प्रयासों में जुटे थे, उनकी ही पार्टी में यह विभाजन महाराष्ट्र की नई राजनीतिक इबारत लिखने वाला होगा, इसमें कोई संशय नहीं है, लेकिन अहम सवाल यही उठता है कि देश की राजनीति आखिर सत्ता की खातिर ऐसे रास्ते पर क्यों चलने लगी है ? पृथक चुनाव चिह्न पर जीत कर आने वाले आसानी से विरोधियों से हाथ क्यों मिलाने लगे हैं ? देखा जाए तो धनबल के सहारे सत्ता पाना और सत्ता के सहारे धनबल हासिल करना आज की राजनीति की विकृति एवं विसंगति बन गया है।
महाराष्ट्र में राकांपा के अंदर मची उठापटक के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में जनता दल युनाइटेड और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा को पार्टी में टूट का खतरा सताने लगा है। ऐसा ही डर कुछ और छोटी पार्टियों को भी है, लेकिन सबसे ज्यादा घबराहट जनता दल युनाइटेड खेमे में देखी जा रही है। यह घबराहट स्वाभाविक भी है क्योंकि उसने भाजपा को जो धोखा दिया था उसका जवाब अब तक भाजपा ने नहीं दिया है। इन विपक्षी दलों की यह घबराहट सत्ता-लोलुपता की प्रवृत्ति के साथ किए गए भ्रष्टाचार के कारण है, मगर पार्टी में सेंध लगने के बाद इन दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने राजनीतिक धरातल को बनाए रखने की है। सवाल यह खड़ा हुआ है कि, क्या नेताओं के साथ-साथ दल का मत आधार भी दूसरे खेमे में चला गया है ? विपक्षी दलों की एकता से पहले ही उनके बिखरने की घटनाएं आश्चर्यकारी होने के साथ ही दलों के कमजोर मनोबल की परिचायक है।
एक और बड़ा प्रश्न है कि, भारतीय राजनीति की शुचिता एवं आदर्श की रक्षा कैसे हो पाएगी ? क्योंकि उभर रही सबसे बड़ी विडम्बना एवं विसंगति यही है कि जनता जिसको सत्ता से बाहर रखना चाहती है वह ऐसे अनचाहे घटनाक्रम से सत्ता हथिया लेता है। दलबदल कानून की धज्जियां उड़ती हुईं देखकर भी अदालतों से लेकर चुनाव आयोग तक ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे। चुनाव बाद होने वाले गठबंधनों में सत्ता-लोलुपता की प्रवृत्ति तब ही रुकेगी, जब संवैधानिक प्रावधानों में जरूरी बदलाव हों। गैर लोकतांत्रिक गठबंधनों को रोकने के लिए राजनीतिक दलों को सशक्त आचार-संहिता से बांधना भी जरूरी है। भारत की जनता को भी ‘राजनीतिक श्रेष्ठ’ की लम्बे समय से प्रतीक्षा है।

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