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रात्रि…

ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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खण्डकाव्य ‘कलयुग’ से…

संध्या फेरी रंग तूलिका, सजी वीथिका अम्बर में,
निमिष मात्र में तिमिर झपट, कालिख पोती क्षण भर में।
मन उड़ रहा उर्ध्य दृग दर्शन, मैं दृश्य अनूप उकेरूँ।
करती कलरव कुलबुल अपने, नीड़ पहुंच पँछी पखेरू।

हुआ क्षीण-क्षीण क्षरित दिवस, रैन रमा रमते-रमते,
मुड़-मुड़ मयंक भागा सरपट, गयी रात थमते-थमते।
पूर्ण पूर्णिमा छूने दौड़ी, लहक- लहक उफना सागर,
जल तरँग फनी फन-सा काढ़े, सिंधु से छलका आगर।

पक्ष-पक्ष में उजली काली, घनी-घनी छायी रजनी,
तनी-तनी सी समय रागनी, झूम-झूम गाती सजनी।
नेति-नेति श्याम धवल नक्षत्र, भरा बम्हाण्ड की झाँपी
नयनाभिराम दृग दर्श निशा, ग्रह पिंड की है झाँकी।

चम-चम चमक रहा चंद्रमा, खोर-खोर गलियारे में,
दमक रही है चारू चाँदनी, छिप-छिप कर चौबारे में।
लिखी सृष्टि कण-कण जीवन, भेज रही आशा पाती,
पृथक-पृथक आभा नैसर्गिक, भाव वृथा मानस व्यापी।

तारे पढ़ते रात-रात भर, दिन-दिन पढ़ते चौघड़िया,
पंडित पिंड खगौलिक समझे, शोध हेतु जो है दरिया।
पाहण दिखे नक्षत्र समीप से, दूर-दूर मोती हीरे,
सप्तवर्णी सपनों की झिलमिल, भग्न ढोल-पोल मंजीरे॥

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।