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रार-हार-तकरार

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’
बूंदी (राजस्थान)
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जिंदगी है महंगी,
और मौत क्यों हो गई सस्ती…??
हाय रे…!!
ये कैसी अनजान मस्ती।
छोटी-छोटी
सतही बातों पर,
क्यों हो रही है
जीवन की केवल
पस्ती और पस्ती (हार)?
जीवन में कभी,
क्या कोई हार न होगी ??
क्या किसी भी स्वजन से,
कभी कोई रार न होगी ??
होगा प्यार ही प्यार,
क्या कोई
तकरार न होगी ??
होगी जीत ही जीत,
क्या कभी हार न होगी ??

रार,तकरार,हार से,
जो हार गए हैं कुंठित जन।
क्यों रम रहा उनका केवल,
मृत्यु पथ पर ही ये मन ??
क्यों नहीं नजर आते,
उन्हें रंगीन जीवन के रंग ??
ना हो इंद्रधनुष तो भी,
बरसते ही,जीवन में कुछ
तो हसीन रंग।
रंगों में भी यदि,
जो हो श्वेत और श्याम
तो क्या रंग न कहलाएंगे ??
जीवन फीका न होगा तब भी,
जब सब ही रंग
जीवन के,
जो संग न आएंगे।

जीत का भी
क्या है मजा है यदि,
उसमें पहले हार न हो ??
प्यार भी लगेगा सजा,
जिसमें कोई तकरार न हो।
जानो,समझो,अपनाओ,
इन मीठे-कड़वे
जीवन के स्वादों को।
जाओगे जिस लोक,
फिर याद करोगे इन्हीं,
खट्टी-मीठी यादों को
पर लौट के फिर आना,
न शायद तब सम्भव होगा।
क्या तुम्हें यकीं है कि,
मृत्यु पार फिर
सुलभ जीवन होगा।
शायद तुमको,
मरने पर ही
ये बात समझ आएगी।
पर तत्क्षण जिंदगी,
तुम्हारे हाथ से निकल जाएगी।

रोष,क्रोध,हार कर,
कभी तुम उस पथ
न बढ़ जाना।
वो पथ केवल जाना ही जाना,
न है लौट के वापस आना।
रार, तकरार, हार से,
यूँ जिंदगी हार नहीं सकती।
मृत्यु सामने भी हो,
जिंदगी को कभी
मार नहीं सकती ??

परिचय–आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार ‘अजस्र’ के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि १७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान बूंदी (राजस्थान) है। आप बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान आदि मिले हैं।

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