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राष्ट्रशक्ति अभिमान

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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अपना सम्मान तिरंगा….


भारत घर-घर तिरंगा, शान-बान-अभिमान।
जन मन गण गाऍं वतन, राष्ट्र धर्म सम्मान॥

गुरु मानस हो पूत सम, शिष्य बने अभिमान।
बिना भेद सब जन सुलभ, ज्ञान मिले वरदान॥

जन-मन अभिवन्दन सदा,लोकतंत्र अभिमान।
संविधान करवा रहा, लोक स्वस्ति का भान॥

जननी जन्मभूमि उभय, पावन दें सम्मान।
पर माता से श्रेष्ठ है, जन्मभूमि अभिमान॥

लाल चौक कश्मीर से, दिल्ली लाल तिरंग।
गायन वन्दे मातरम्, जन मन भारत संग॥

सही-गलत का फासला, करने में अनजान।
गुणी वचन नहि मानता, मदमाता अभिमान॥

मानक नित सौभाग्य का, नार्य शक्ति अभिमान।
चुटकी भर सिन्दूर से, सजी मांग सम्मान॥

नमन करे कवि कामिनी, दे श्रद्धा सम्मान।
स्वामी जी गाथा विजय, गाए मन अभिमान॥

प्रगति राष्ट्र जग वे बनेनिज भाषा अभिमान।
विरत राष्ट्रभाषा जगत, हो वजूद अवसान॥

शौर्य शक्ति से शान्ति हो,प्रेमशक्ति सम्मान।
त्याग शक्ति सुख प्राप्ति हो, राष्ट्र शक्ति अभिमान॥

हेतु सतत मानव पतन, लोभ मोह अभिमान।
कोप शोक तज सत्य पथ, मिले प्रगति सम्मान॥

सोच सभी की एक सी, साहित्यिक अभिमान।
करे स्वयं नित वन्दना, इतर करे अपमान॥

बिना काम अभिमान का, स्वार्थ बना गठजोड़।
सत्य न्याय तूफान में,उड़े होश हर मोड़॥

ज्ञानविरत मतिहीनता, ऐंठन नित अभिमान।
सूख ठूँठ तरु राख सम, नर का हो अवसान॥

निर्विवेक विद्वान नित, करे कपट आधान।
पर निन्दा रत हो मुदित, अपमानित अभिमान॥

आज मीत पाऊँ कहाँ, हो श्रीकृष्ण समान।
सुख विपदा में साथ दे, मीत करे अभिमान॥

आज करें जयघोष हम, भारत और प्रधान।
दीप जलायें शान्ति का, जगे वतन अभिमान॥

शंखनाद करती कमल, ले सशक्त अभियान।
तन मन धन माँगे वतन, पूरण हो अरमान॥

हिन्द देश परिवार हम, हिन्दी भारत शान।
लोकतंत्र अभिमत वतन, संविधान सम्मान॥

लखि ‘निकुंज’ का कवि हृदय, नमन मुदित जनतंत्र।
शान देश वैज्ञानिकों, आप प्रगति शुभ मंत्र॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥