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विमला

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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घड़ी पर निगाह डालते ही सुधा नाराजगी से बड़बड़ाने लगीं। आने दो विमला को, आज ही इसका हिसाब करके छुट्टी कर दूँगी। रोज को रोज डांटने से उनका ही मूड खराब हो जाता है, लेकिन इसको कोई फर्क नहीं पड़ता। वह मन ही मन भुनभुना रहीं थीं। तभी डोरबेल की आवाज हुई। उन्होंने दरवाजा खोला तो विमला डरी सहमी-सी बोली, ”राम राम दीदी“ फिर वह धीरे से मुस्कुराई।
 राम-राम का जवाब तो देना ही था। वह गुस्सा दबा कर धीरे से राम-राम बोली थीं।
  वह झाड़ू लेकर अपने काम में   तेजी से जुट गई। वह डाइनिंग टेबल पर बैठ कर चाय पीती जा रही थी और सोचती हुई अपना इरादा पक्का कर रही थी। इसका तो रोज का काम हो गया है देर से आना, सुबह-सुबह उनका मूड और खराब हो जाता है। आज इसका हिसाब कर देना ही ठीक होगा।
विमला को फर्श को रगड़–रगड़  कर चमकाते देख कर वह सोचने लगी, कि वह इसे हटाने के लिए तो तैयार है, लेकिन दूसरी इतना साफ काम करने वाली मिलेगी भी कि नहीं…? दूसरी बाई की क्या गारंटी कि वह कैसा काम करेगी ? मन ही मन वह उधेड़बुन में थी, कि इसे हटाएंगें तो किसे रखेंगें।
विमला पोंछा लगा रही थी। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी कमर को पूरी तरह से ढका हुआ था। किसी तरह पैर के नीचे साड़ी दब जाने के कारण उसकी कमर खुल गई थी। कमर पर तीन-चार गहरी लकीरें दिखाई पड़ रहीं थी।
“क्यों विमला, तू आज भी अपने पति से पिट कर आई है…?
छोड़ क्यों नहीं देती उस जालिम पति को ?”
वह वहीं बैठ गई और बोली , “दीदी यदि इसे छोड़ देंगें तो मोहल्ले में जो भूखे भेड़िए घूमते रहते हैं, मुझे एक दिन भी जिंदा नहीं छोड़ेंगें। जैसा भी है, मेरे बच्चों का बाप है। बच्चों को अँग्रेजी स्कूल में पढ़ाता है। बस जब नशा करके बहक जाता है, तभी हाथ उठाता है।
दीदी मेरी छोड़ो, यह सब तो रोज का काम काज है। दीदी, प्रॉमिस कल से मैं जल्दी आया करूगीं।” कहते हुए फर्श को चमकाने में लग  गई थी।
वह सोचने लगी, कि कभी-कभी समस्या ही समाधान होती है। इस कम पढ़ी-लिखी ने समझ लिया था कि बद से बदतर में एक देहरी का अंतर है। वह सोच रही थी कि अपने पति विवेक को कहूँगी कि वह उसके पति को समझाए, शायद समझाने का कुछ असर हो।
 वह उठी और उसके लिए चाय बनाने लगीं। ये बेचारी सुबह से ही घर से निकली होगी, कुछ खाया थोड़ा ही होगा।
“विमला चाय पीकर जाना।”