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विश्वास का पर्याय ‘प्रतीक्षालय’

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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एक दिन प्रतीक्षालय में रुका मैं बनारस,
भीड़ बड़ी थी, पहुँचा बिताकर कई बरस
प्रथम श्रेणी का यात्री होकर सीट को गया तरस,
घूमता पहुँचा द्वितीय श्रेणी में आया थोड़ा हर्ष,
यहाँ स्थान खाली मिला और मन हो गया सरस।

किसी की किसी से नहीं थी कोई पहचान,
एक-दूसरे से सभी पूरी तरह से दिखे अनजान
इतने में शौचालय का आया हमें संज्ञान,
मैंने इच्छा बगल के यात्री को बता किया परेशान
लेकिन वो हमें देखकर ही लगा ‘है अच्छा इंसान।’

तपाक से बोला-‘साहब आप जाओ मैं देखता हूँ सामान’,
मेरे लिए तो ‘जान न पहचान- मैं तेरा मेहमान’
कलयुग है यारों लेकिन रेल प्रतीक्षालय में मित्रवत है सम्मान,
डरते-डरते संदेह में बढ़ा शौचालय के स्थान
लौटा सही-सलामत देख सामान, आई जान में जान।

तीसरे यात्री ने कहा-‘आता हूँ साहब देखना सामान’,
‘हाँ ठीक है’ कहकर मैं उसके भाव गया जान
घंटों बिताकर व्यक्ति लौटा तो जगा मेरे अंदर अभिमान,
पूरा मस्त-व्यस्त भाव न शिकन, न चिंता के निशान
गजब मानवता निभाते हैं प्रतीक्षालय में बच्चे, बूढ़े, जवान।

सामान्य यात्री डिब्बे में मारा- मारी, सीट कब्जे की अद्भुत दास्तान,
सामान्य डिब्बे की यात्रा आम लोगों को नहीं है आसान
सामान्य यात्रा में बहुतेरे होते हैं व्यवधान, क्या करूँ बखान !
देखकर नहीं लगता यह दृश्य ‘मेरा भारत महान’,
रेल के प्रतीक्षालय में दिखता है अपना हिंदुस्तान॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएससी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता, रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुंबई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़ें हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको
महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२० २३ सहित अन्य सम्मान हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले संजय सिंह ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज- पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”