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शांत हवा

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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शीतल मंद समीर
एकदम शांत।
कहीं से मन में उठता
कोई बगुला-सा,
दूसरे ही पल सब कुछ
शांत।
अंतर्मन में उठता हुआ तूफान,
अभी कुछ ही दिन तो
हुए थे शादी को,
एकाएक
बह निकली,
आँखों से आँसू की
धार।
छत पर बैठे,
मेरे बालों में गजरा
गूँथ रहे थे,
हल्की किंतु शांत हवा
मैंने शरमा कर,
आँखें नीची कर ली
और सुबक पड़ी,
क्योंकि
कल ही तो जाना था,
उन्हें सीमा पर।
पास के नीम का एक भी,
पत्ता नहीं हिल
रहा था।
याद करके दिल भर आया,
कहाँ होगे…
कैसे होंगे वो ?
गोलियों की तड़तड़ाहट के
बीच,
मन अशान्त था…
और हवा एकदम शांत।
जैसे मुझे
समझा रही हो,
मगर मन हवा की तरह
शांत न हो सका।
दूर किसी श्वान के रोने की
आवाज ने,
दिल दहला-सा दिया।
सुबह उनकी बिदाई ने मुझे
झकझोर दिया।
अंक में लेते हुए बोले,
प्रिये…
और इससे आगे,
वो भी कुछ न कह सके।
सीने से लगकर,
सुबक पड़ी मैं।
यादों के झरोखे से निकल कर,
कितना समय बीत गया।
रोज ही किसी के
हताहत होने की खबरें,
प्रसारित होती।
मन चिंहुक उठता,
कहीं
वो तो नहीं ?
नीरव रात्रि सुनसान,
आज कुछ
ज्यादा ही।
अकुलाहट बढ़ गई,
और भी उस
दस्तक के साथ जो,
अचानक
दरवाजे पर पड़ी।
देखा तो,
कुछ फौजी कुछ
सामान लिये हुए अंदर आये,
मैं पत्थर हो गई…
कलेजा मुँह को आ गया।

उन्होंने बताया
दुश्मनों से लड़ते हुए,
वीरगति को प्राप्त हुए।
और आज भी,
एक तूफान-सा उठ रहा था
मन में,
मगर हवा बिल्कुल
शांत थी।
मैं निस्तेज,
शांत
आसमान में झांकते हुए,
शायद वहीं से
मुझे सांत्वना दे रहे हों।
शांत रहो,
बिल्कुल आज की
शांत हवा की
तरह॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है।