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शाबाशी है बेहतरीन औषधि

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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विश्‍व समुदाय का मानना है कि रचनात्‍मकता ही विश्‍व की सबसे अनमोल निधि है, जिसके सहारे हम अपने सतत विकास की रफ्तार को बनाए रख सकते हैं। हिंसा और वैमनस्‍य के दौर में रचनात्‍मकता ही है, जो विश्‍व को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सकती है।
इस रचनात्‍मकता की शुरूआत घर से ही होती है। मिट्टी, रंग, कपड़ा, कागज, पेड़…वह कुछ भी जिसे हम आप देख सकते हैं, छू सकते हैं रचनात्‍मकता के सांचे में ढल कर और सुंदर हो जाता है। सबसे ज्‍यादा जरूरी है कि बच्‍चों में यह रचनात्‍मकता बनी रहे। इसके और बच्चे के रचनात्मक विकास के लिए ज़रूरी है कि अपने मन का काम करते समय उसे टोका न जाए। टोका-टाकी और ज़्यादा सुझाव उसकी कल्पनाशक्ति को प्रभावित करते हैं।
इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि बच्‍चे की रचनात्‍मकता ही उसके विकास का संकेत है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्‍वस्‍थ बच्‍चे ही इसमें बेहतर योगदान कर सकते हैं, पर कई बार अभिभावक और शिक्षक की गलती से बच्‍चों की यह रचनात्‍मकता बाधित होती है।
आपकी भूमिका बच्चे को सिर्फ़ सामान ख़रीदकर देने तक होनी चाहिए। अगर उसे ड्रॉइंग करने में मज़ा आता है तो पेंसिल-रबर, ड्रॉइंग बुक आदि उसे ख़रीद कर दें। लिखने में रुचि है तो अच्छी किताबें ला कर दें। वह जो करना चाहता है, उसे करने दें।
कुछ बच्चे काग़ज़ के बजाय दीवार पर लिखते या ड्रॉइंग करते हैं। अगर आपका बच्चा भी दीवार पर अपनी रचनात्मकता उकेरने में आनंद महसूस करता है, तो दीवार ख़राब होने या पेंट कराने की वजह से उसे रोकें नहीं। बच्‍चों की रचनात्‍मकता के लिए ये दीवारें कैनवास का काम करती हैं। उसे उसमें अपने मन के रंग भरने दें।
जब हम अपनी तरफ से बच्‍चे को कोई विषय या विचार देते हैं तो उसे सीमाओं में बांध देते हैं। इस तरह उसकी सोच का दायरा सिकुड़ जाएगा। अगर बच्चा ख़ुद आपसे मदद मांगे तो सीधे तौर पर मदद करने के बजाय बात करें। बातों में उसे बताएं कि किस फूल में लाल, किसमें गुलाबी, किसमें पीला रंग भरते हैं। कुछ ही देर में उसके दिमाग़ में ख़ुद विचार आ जाएगा और वह बातचीत छोड़ कर फूल में रंग भरने लग जाएगा।
आमतौर पर लोग बच्चों को यह बताने में गर्व महसूस करते हैं, ‘अगर तुम यह रंग थोड़ा गहरा कर देते’ या ‘गुड़िया के बाल काले कर देते’ तो तुम्हारी ड्रॉइंग और सुंदर हो जाती। इस तरह के सुझाव से बच्चे को लगता है कि उसकी बनाई ड्रॉइंग ठीक नहीं है। वह दोबारा अपनी कल्पनाशक्ति इस्तेमाल नहीं करता। इसकी बजाय सकारात्मक टिप्पणी करें, जैसे ‘तुमने अच्छा बनाया है’, ‘तुम अच्छे कलाकार हो’ आदि। इससे बच्चे का हौंसला बढ़ेगा।
याद रखिए कि, शाबाशी बच्‍चों ही नहीं ब‍ड़ों के लिए भी औषधि (टॉनिक) का काम करती है। इसलिए बच्‍चे को यह देते रहें। बच्चे ने जो भी बनाया है, उसे संभाल कर रखें। उसकी बनाई ड्रॉइंग्स को फ्रेम कराकर घर में लगाएं। बच्चे का ख़ुद पर भरोसा बढ़ेगा। अगली बार वह ज़्यादा उत्साह से जुटेगा। वैसे भी बच्चे ने क्या और कैसा बनाया है, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसे बनाने में बच्चे को कितना मज़ा आया है। इस दिन से प्रेरित होकर नया करने की सीख मिलती है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

 

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