Visitors Views 12

शिवाजी,जनरल स्कीन और मोदी

राकेश सैन
जालंधर(पंजाब)
*****************************************************************
२७ मार्च की सुबह ११.१६ बजे का समय उस समय इतिहास में दर्ज हो गया,जब भारत ने अंतरिक्ष युद्ध के क्षेत्र में पदार्पण किया। यह गौरवशाली कारनामा करके देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास के उन महापुरुषों की श्रेणी में शामिल हो गए,जिन्होंने अपने-अपने समय में देश की रक्षा के समक्ष उपजी चुनौतियों का सामना करने के लिए नए पुरुषार्थ किए। देश में नौसेना को पुनर्जीवित करने का श्रेय छत्रपति मराठा सरदार शिवाजी को जाता है तो वायुसेना की स्थापना ८ अक्तूबर १९३२ को जनरल स्कीन समिति की रिपोर्ट की सिफारिश पर की गई। बदलते हुए समय के साथ अब जब पूरी दुनिया के सामने अंतरिक्ष युद्ध का भी खतरा मंडराने लगा तो इसके लिए देश को शक्तिशाली बनाने का श्रेय निश्चित तौर पर इतिहास नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को ही देगा। यह ठीक है कि,भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना के बाद से ही देश ने अनेक उपग्रहों व प्रक्षेपास्त्रों का सफल परीक्षण किया है,परंतु मिशन शक्ति की सफलता देश को नए क्षेत्र में प्रवेश के गौरव का एहसास करवा रही है।
फरवरी २०१७ में जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान ने एक प्रक्षेपास्त्र के जरिए १०४ उपग्रहों को सफलता पूर्वक अंतरिक्ष में भेजा तो सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था अमरीका बनाम रूस भूल जाइए,क्योंकि अंतरिक्ष में असली दौड़ तो एशिया में चल रही है। इस रिपोर्ट में भारतीय सफलता की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई थी। एशिया में भारत,चीन और जापान अंतरिक्ष में एक लंबा सफर तय कर चुके हैं। अब भारत ने उपग्रह रोधी प्रक्षेपास्त्र का सफलता पूर्वक परीक्षण किया है। इस परीक्षण में भारत ने ३०० किलोमीटर दूर एक उपग्रह को मार गिराया। इस सफलता के साथ ही भारत अब अमरीका,रूस और चीन की पंक्ति में खड़ा हो गया है। २ रॉकेट बुस्टर के साथ १८ टन की मिसाइल से ७४० किलो के उपग्रह को पृथ्वी की निचली परिधि में ३ मिनट में मार गिराया गया। भारत अब उपग्रह घातक प्रक्षेपास्त्र से अपने दुश्मन के उपग्रह को नष्ट कर सकता है। इसका परीक्षण ३०० किलोमीटर की ऊंचाई पर किया गया है,लेकिन विकास संगठन के वैज्ञानिकों का मानना है कि जरूरत पड़ने पर १००० किलोमीटर तक भी जाया जा सकता है।
रणनीतिक दृष्टि के साथ-साथ सुरक्षा व विज्ञान की दृष्टि से भारत की यह बहुत बड़ी सफलता है। सभी जानते हैं कि तकनीकी व सूचना क्रांति की आवश्यकताओं के चलते अंतरिक्ष में उपग्रहों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है और इससे पृथ्वी को नए तरह के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। अपनी आयु पूरी करने के बाद यही उपग्रह नियंत्रणहीन हो जाते हैं या इनकी आवश्यकता नहीं रहती। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति से दूर होने के कारण यह धरती पर भी नहीं गिरते और अंतरिक्ष में ध्वनि की गति से भी कई हजार गुणा तेज गति से घूमते रहते हैं। कई बार तो यह अन्य उपग्रहों के साथ-साथ धरती पर जीवन के लिए असुरक्षा के कारण भी बन जाते हैं। याद करें २००७ और ०८ में अमेरिका के उपग्रह नियंत्रणहीन हो अंतरिक्ष से गिर रहे थे,तो नासा ने इसी तकनीक से इनको धरती से सैकड़ों किलोमीटर दूर ही मार गिराया। भारत के पास भी यह तकनीक आई है,तो इसका स्वागत होना चाहिए,क्योंकि भविष्य में इस तरह की कोई परिस्थिति पैदा हो तो हम उससे अपने स्तर पर निपट सकते हैं।
सामरिक दृष्टि से भी इस तकनीक का विशेष महत्त्व है,क्योंकि जिस तरह हम पाकिस्तान जैसे दुश्मन और चीन जैसे चालबाज देशों से घिरे हैं,ऐसे में भारत का तकनीकी रूप से एक कदम आगे रहना ही उचित है। सभी जानते हैं कि अमेरिका का अफगानिस्तान से मोहभंग हो चुका है और वह अपनी नाटो सेना के साथ जल्द ही यहां से रवाना होने वाला है। अमेरिका की अनुपस्थिति में वह तालिबान फिर हावी हो सकता है,जिसका नियंत्रण काफी सीमा तक पाकिस्तान के हाथ में है। कमजोर नेतृत्व वाला परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान भविष्य की एक अत्यंत खतरनाक तस्वीर पेश करता है। पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि वहां के परमाणु हथियार कभी भी आतंकियों या कट्टरपंथियों के हाथ लग सकते हैं। ऐसे में भारत का नवीनतम सामरिक तकनीकों से सज्जित होना अत्यंत जरूरी है,ताकि हम उस समय की परिस्थितियों से निपट सकें। यूँ भी पाकिस्तान की सेना व राजनीतिक नेतृत्व गाहे-बगाहे भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के नाम पर दबाने की कोशिश करता रहता है। मिशन शक्ति की सफलता से इस बात की पूरी संभावना है कि उसके दबाने का यह क्रम अवश्य थमेगा।
जैसा कि सामरिक मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि युद्ध में केवल सैनिक व हथियार ही सब-कुछ नहीं होते,बल्कि संचार व्यवस्था भी बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। विश्व की संचार व्यवस्था अधिकतर उपग्रहों पर ही निर्भर है और उपग्रहों की मारक क्षमता होने के कारण किसी भी आशंकित युद्ध में हम दुश्मन सेना को दिशाहीन व सूचनाविहीन कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत की यह शक्ति किसी देश को डराने-धमकाने के लिए नहीं,बल्कि आत्मरक्षा के लिए है। भारत का इतिहास भी यही रहा है कि,हमने शक्ति का आह्वान मानव कल्याण व दुष्टों के संहार के लिए किया है,न कि कमजोरों पर अत्याचार ढहाने या धौंसपट्टी जमाने के लिए। वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने ठीक ही कहा है कि किसी गैर-जिम्मेवार देश का शक्तिसंपन्न होना पूरी मानवता के लिए घातक है और जिम्मेवार देश का शक्तिशाली होना मानवता की सुरक्षा,विश्व की शांति के लिए आवश्यक है। पोखरन में किए परमाणु परीक्षणों व घातक प्रक्षेपास्त्रों के परीक्षण के बाद भी भारत ने जिस तरह से अति विकट समय में भी संयम व धैर्य का परिचय दिया है,वह पूरी दुनिया को आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त है कि हमारा यह कार्यक्रम केवल और केवल आत्मरक्षा के लिए है। भारत विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और विकास की पहली शर्त सुरक्षा व शक्तिसंपन्न होना है। निर्बल हाथों आई संपदा उसकी दुश्मन बन सकती है। हम शांति पसंद हैं परंतु विद्वान कहते हैं कि शांति तभी संभव है जब आप सदैव युद्ध के लिए तैयार रहें और शक्तिसंपन्न हों। कमजोर व्यक्ति की शांतिप्रियता को कोई महत्त्व नहीं देता। इसी शक्ति का पूजन करते हुए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं-
“तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति सिंधु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द अनुनय के प्यारे प्यारे।
उत्तर में जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से,
उठी अधीर धधक पौरुष की आग राम के शर से।
सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में,
चरण पूज दासता गृहण की बंधा मूढ़ बन्धन में।”