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शिव एवं शिवत्व:संतापों का शमन

अमल श्रीवास्तव 
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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देवाधिदेव महादेव के बारे में कुछ भी कहना, सुनना, सुनाना, जानना, समझना- समझाना सूरज के सामने दीपक दिखाने जैसा ही मानना चाहिए । महर्षि वेदव्यास जी २४ हजार श्लोकों के साथ ‘शिव महा पुराण’ तथा ११ हजार श्लोकों के साथ ‘लिंग पुराण’ में भगवान शिव के बारे में सारी जानकारियाँ पहले ही दे चुके हैं।फिर भी जनसामान्य भगवान शिव और शिवत्व के बारे में परिचित हो सके तथा कई तरह की भ्रांतियों से छुटकारा पा सके, इस दृष्टि से-
शिव का अर्थ होता है ‘शुभ’, शंकर का अर्थ होता है ‘कल्याण कारी’ और रूद्र का अर्थ होता है ‘विनाश कारी।’ भगवान शिव के लाखों नाम हैं, परन्तु सामान्यजन इन्हीं तीन नामों शिव, शंकर, और रूद्र से परिचित हैं। इनका सामान्य अर्थ यही है कि, भगवान शिव शुभ कारी हैं, कल्याण कारी हैं और दोष-दुर्गुणों के विनाशक हैं।

भगवान शिव पर भांग,धतूरा, गांजा आदि मादक पदार्थों के चढ़ाए जाने की परम्परा है। इसका सामान्य भाव यही है कि, इनके कल्याणकारी (औषधीय गुणों) को ग्रहण किया जाए और विनाशकारी (नशे की लत) का त्याग किया जाए।
मस्तक में चंद्रमा और गंगा के धारण का सामान्य अर्थ यही है कि, शिव भक्तों को चन्द्रमा जैसा शीतल एवं गंगा जैसा पवित्र होना चाहिए। गले में सर्पों की माला, भूत-प्रेतों का साथ, श्मशान में निवास, समत्व एवं वैराग्य भाव का द्योतक है।
पार्वती माता को ‘श्रृद्धा’ और भगवान शिव को ‘विश्वास’ कहा गया है। उनके दोनों पुत्र स्वामी कार्तिकेय और प्रथम पूज्य गणेश जी यही संदेश देते हैं कि, यदि श्रृद्धा और विश्वास का मिलन होता है तो, कार्तिकेय जैसा पराक्रमी और गणेश जैसा कुशाग्र बुद्धि का प्रादुर्भाव होता है।
यों तो पूरे विश्व में लाखों की संख्या में शिव के विग्रह और मंदिर हैं, परन्तु द्वादश ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है। यह हैं-
सौराष्ट्रे सोमनाथं च
श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।

उज्जयिन्यां महाकालं
ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥

परल्यां वैद्यनाथं च
डाकिन्यां भीमशङ्करम्।

सेतुबन्धे तु रामेशं
नागेशं दारुकावने॥

वाराणस्यां तु विश्वेशं
त्र्यम्बकं गौतमीतटे।

हिमालये तु केदारं
घुश्मेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि
सायं प्रातः पठेन्नरः।

सप्तजन्मकृतं
पापं स्मरणेन विनश्यति॥
jशिव कौन है, शिव तत्व क्या है ? इस सृष्टि में शिव का क्या महत्व है ? इस सृष्टि का संबंध शिव से क्या है ? क्या यह सृष्टि शिवतत्व के अधीन है ?
शिवत्व में ‘शिवतत्व’ और ‘शक्तितत्व’ दोनों का अंतर्भाव होता है। परमशिव प्रकाश विमर्शमय है। इसी प्रकाशरूप को शिवतत्व और विमर्शरूप को शक्तितत्व कहते हैं। यही विश्व के सृजन, पोषण और संहार के रूप में प्रकट होता है। शिवत्व को समझने के लिए भौतिक परिधि से कुछ आगे निकलना पड़ेगा।
आधुनिक विज्ञान मानता है कि, पूरी संरचना को इंसान के तर्कों पर खरा उतरना चाहिए, परन्तु यह संपूर्ण सृष्टि मानव बुद्धि के तर्कों पर कभी भी खरी नहीं उतर सकती। हमारा दिमाग इस सृष्टि में तो समा सकता है, परन्तु यह सृष्टि हमारे दिमाग में कभी भी समा नहीं सकती। इसलिए तर्क इस अस्तित्व के केवल उन पहलुओं का ही विश्लेषण कर सकता है, जो भौतिक हैं। एक बार अगर जिज्ञासु भौतिक पहलुओं को पार कर लेता है तो उसे शिवत्व को जानने-समझने में आसानी होती है।
संसार में ३ प्रकार के कार्य निरंतर चलते रहते हैं-उत्पत्ति, पालन और संहार। इन्हीं भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए इन्हें ३ नाम दे दिए गए हैं-ब्रह्मा, विष्णु और महेश। विष्णु सतगुण मूर्ति हैं, ब्रह्मा रजोगुण मूर्ति और शिव तामसगुण मूर्ति हैं। शिव तामसी गुणों के अधिष्ठाता हैं। तामसी गुण यानी-निंदा, क्रोध, मृत्यु, अंधकार, आलस्य, भय, शोक, अहंकार, तृष्णा, वासना आदि। तामसी भोजन यानी-कड़वा, विषैला, तीखा, खारा, भोजन आदि।
जिस अपवित्रता से, जिस दोष के कारण किसी वस्तु से घृणा की जाती है, शिव उसे धारण कर उसे भी शुभ बना देते हैं। समुद्र मंथन के समय निकले विष को धारण कर वे नीलकंठ कहलाए। जिससे जीव की मृत्यु होती है, वे उसे भी जय कर लेते हैं। तभी तो उनका नाम मृत्युंजय है। इसी लिए कहा जाता है कि,-
‘भावी मेट सकहि त्रिपुरारी।’
यही शिवत्व का आधार है।
शिव के बारे में यही कहा जा सकता है कि,
आदि, अन्त, और मध्यमान शिव है।
भाग्य, भी, विधाता भी, विधान शिव है।
जल, थल और आसमान शिव है।
मन, चित, आत्मा है, प्राण शिव है॥’
शिव ही ब्रह्मा के रूप में सृष्टि का निर्माण, विष्णु के रूप में उसका पालन-पोषण और शंकर के रूप में इस सृष्टि की बुराईयों का अंत करते हैं। इसीलिए कहा गया है कि,
‘ब्रह्मा, विष्णु, सदा शिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥’
यही कहा जा सकता है कि, भगवान शिव की आराधना निर्मल भाव से करने पर लौकिक और परलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं एवं दैहिक, दैविक, भौतिक सभी तरह के संतापों का शमन होता है।

परिचय–प्रख्यात कवि,वक्ता,गायत्री साधक,ज्योतिषी और समाजसेवी `एस्ट्रो अमल` का वास्तविक नाम डॉ. शिव शरण श्रीवास्तव हैL `अमल` इनका उप नाम है,जो साहित्यकार मित्रों ने दिया हैL जन्म म.प्र. के कटनी जिले के ग्राम करेला में हुआ हैL गणित विषय से बी.एस-सी.करने के बाद ३ विषयों (हिंदी,संस्कृत,राजनीति शास्त्र)में एम.ए. किया हैL आपने रामायण विशारद की भी उपाधि गीता प्रेस से प्राप्त की है,तथा दिल्ली से पत्रकारिता एवं आलेख संरचना का प्रशिक्षण भी लिया हैL भारतीय संगीत में भी आपकी रूचि है,तथा प्रयाग संगीत समिति से संगीत में डिप्लोमा प्राप्त किया हैL इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स मुंबई द्वारा आयोजित परीक्षा `सीएआईआईबी` भी उत्तीर्ण की है। ज्योतिष में पी-एच.डी (स्वर्ण पदक)प्राप्त की हैL शतरंज के अच्छे खिलाड़ी `अमल` विभिन्न कवि सम्मलेनों,गोष्ठियों आदि में भाग लेते रहते हैंL मंच संचालन में महारथी अमल की लेखन विधा-गद्य एवं पद्य हैL देश की नामी पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैंL रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केन्द्रों से भी हो चुका हैL आप विभिन्न धार्मिक,सामाजिक,साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े हैंL आप अखिल विश्व गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। बचपन से प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कृत होते रहे हैं,परन्तु महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रथम काव्य संकलन ‘अंगारों की चुनौती’ का म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मलेन द्वारा प्रकाशन एवं प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा उसका विमोचन एवं छत्तीसगढ़ के प्रथम राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय द्वारा सम्मानित किया जाना है। देश की विभिन्न सामाजिक और साहित्यक संस्थाओं द्वारा प्रदत्त आपको सम्मानों की संख्या शतक से भी ज्यादा है। आप बैंक विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. अमल वर्तमान में बिलासपुर (छग) में रहकर ज्योतिष,साहित्य एवं अन्य माध्यमों से समाजसेवा कर रहे हैं। लेखन आपका शौक है।