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संवेदनशीलता आज की आवश्यकता

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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विश्वास:मानवता, धर्म और राजनीति…

संवेदनशीलता अपने व पराए में फर्क करती ही नहीं। संवेदनशीलता के अभाव में ही अनैतिक कार्य, अपराध की घटनाएं वगैरह दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं। आज भी पुस्तकों के माध्यम से विद्यालयों में बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जाते हैं, लेकिन वे प्रभावशाली क्यों नहीं होते ? उसका मुख्य कारण है सामाजिक परिवेश। यदि पुस्तक में वर्णित व्यवहार से उलट व्यवहार वे अपने शिक्षकों अथवा माता-पिता में देखते हैं, तो बच्चे भ्रमित हो उनका ही अनुसरण करना शुरू कर देते हैं। यह स्पष्ट है कि, पढ़ाई-लिखाई से ही व्यक्ति में संवेदनशीलता का गुण विकसित नहीं होता है। यदि अनपढ़ व्यक्ति भी अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी व शिक्षक वगैरह में जब यह गुण देखता है तो वह भी अनुभव करने के लिए प्रेरित होता है, और व्यवहार में जब नियमितता आ जाती है तब उसे जो आनन्द, सुकून मिलता है, तब यह आदत भी बनती है और वह बिना परवाह किए जीवन में औरों को भी प्रेरित करता चला जाता है।
हमारे मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एन. शेषन के जीवन से जुड़ी एक सत्य घटना-
कि जब वे मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब उत्तर-प्रदेश की यात्रा के समय अर्द्धांगिनी भी साथ थी। रास्ते में अचानक उनकी पत्नी ने सड़क किनारे एक वृक्ष पर बया (एक प्रकार की चिड़िया) का घोंसला देखा। घोंसले ने उनको इतना प्रभावित किया कि, उन्होंने उस घोंसले की मांग कर डाली। श्री शेषन ने पहले तो अपने सुरक्षाकर्मी को उतार लाने को कहा, लेकिन जब उससे सम्भव नहीं हुआ तो वहीं सामने भेड़-बकरियां चरा रहे लड़के को पैसे का लालच दे उतार लाने को कहा। आप आश्चर्य करोगे यह जानकर कि, उस बालक ने स्पष्ट मना करते हुए कह दिया कि, ‘आप कितना भी पैसा क्यों न दो, मैं नहीं उतारूंगा।’ जब उसने उसका कारण बताते हुए यह कहा कि, ‘साहब, इस घोंसले में चिड़िया के बच्चे हैं। शाम को जब उसकी ‘माँ’ खाना लेकर आएगी और यहाँ बच्चे नहीं मिलेंगे तो वह बहुत उदास होगी’, तो शेषन निरूत्तर हो उसको ताकते रह गए।
इस घटना के विषय में श्री शेषन ने लिखा है-‘मुझे जीवन भर इस बात का अफ़सोस रहा कि, एक पढ़े-लिखे आईएएस में वो विचार और भावनाएं क्यों नहीं आईं, जो एक अनपढ़ लड़के ने बता उन्हें निरूत्तर कर यह सोचने को मजबूर कर दिया ?’ वे यहीं नहीं रुके, उन्होंने आगे लिखा कि-‘मेरी आईएएस की डिग्री, पद, प्रतिष्ठा, पैसा सब उस अनपढ़ बच्चे के सामने बेकार साबित हो गए। और यह समझ में आ गया कि, ‘सही समय पर सही समझ’ चरितार्थ होना सबसे अहम है।’
उपरोक्त घटना से यही बताने की कोशिश है कि, बुद्धि और धन जीने के लिए अवश्य आवश्यक है, लेकिन जीवन तभी आनंददायक बनेगा, जब साथ में संवेदनशीलता भी हो।इसलिए आवश्यक है कि, बचपन से ही नैतिकता, मानवीयता और संवेदनशीलता के संस्कार विकसित किए जाएं।
मेरा मानना है कि नैतिकता, मानवीयता और संवेदनशीलता में से एक भी गुण विकसित होगा, तो बाकी बचे गुण अपने आप प्रस्फुटित हो जाएंगे।