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सच्ची होली

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड) 
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रंग और हम(होली स्पर्धा विशेष )…

होली का त्यौहार मनाया जा रहा है। बच्चे,बूढ़े और जवान सभी के मन में होली की उमंग चरम सीमा पर पहुँच गई है। चारों ओर लोग एक-दूसरे को बधाईयाँ देते, गीत गाते हुए होली की खुशियाँ मना रहे हैं।
प्रायः सभी लोग इसकी तैयारी वसंत पंचमी से ही आरम्भ कर देते हैं। सभी रंग,अबीर,गुलाल और पिचकारी लेते एवं होली के लिए विशेष तरह के कपड़े बनवाते हैं। होली के दिन सभी एक-दूसरे को रंग लगाते हुए मस्ती में झूमते हैं,फगुवा के गीत गाते हैं।
मैं भी आमजन की भाँति आज खुश और स्वादिस्ट पूआ पकवानों का सेवन करके होली खेलने के लिए तैयार हो गया। दोस्तों के बुलाने पर तुरन्त ही निकल कर मंडली में शामिल हो गया। मंडली में शामिल सभी बन्धुजनों के साथ गुलाल खेलते और गले मिलते हुए आगे बढ़ा। फिर मंडली से मिलकर उन दोस्तों के घर गए,जो मेरे समान बाहर निकले नहीं थे। किसी-किसी को तो खींचकर जबरन घर से बाहर निकालना पड़ा।
मंडली में लगभग सभी बन्धु-बांधवों की उपस्थिति हो जाने के पश्चा मोड़ के चौराहे पर चबूतरे एवं उसके चारों ओर बैठकर गाने-बजाने के कार्य का श्रीगणेश किया गया। सम्पूर्ण वातावरण में मस्ती ही मस्ती का माहौल बन गया। ऐसा ही माहौल घंटों तक चला। राहगीर भी इसमें कुछ समय शामिल होते और अपने रास्ते चलते जाते।
चारों ओर का वातावरण रंग,गुलाल,संगीत, नृत्य से अत्यंत मनमोहक हो गया। लगने लगा सही मायने में हम २१वीं सदी के मानव हैं,जहाँ चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली है। हमारी तरक्की को देख धरती माता भी खुश होती होंगी एवं स्वर्ग में इंद्र भी हमें ललचाई निगाहों से देखते होंगे कि अगर ऐसा ही होता रहा तो एक दिन मानव उनसे भी आगे निकल जाएंगे।
शाम को काफी अंधेरा होने के उपरान्त ही मंडली भंग हुई और सभी अपने-अपने रास्ते हो लिए।
मैं भी वहाँ से निकला और निश्चय कर लिया कि सीधे तालाब चलेंगे,तथा नहाने के बाद ही घर जाएँगे,क्योंकि मेरा पूरा शरीर रंग से भरा पड़ा था। यही सोच मेरे कदम तालाब की और बढने लगे। मन में उमंग थी,पर मस्तिष्क शान्त था। इस शांतिमय वातावरण में मुझे किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई दी। मैंने ध्यानपूर्वक देखा किन्तु कुछ भी नहीं दिखाई दिया। अब इसे अपना भ्रम मानते हुए आगे बढ़ गया,किन्तु मुझे पुनः वही आवाज सुनाई दी। अब मैं पूर्ण रूप से समझ गया कि यह भ्रम नहीं है।
रात्रि के पहर में ऐसे आवाज सुन पहले तो मैं डर गया कि कहीं मुझे कोई भूत-प्रेत ने तो नहीं घेर रहा है। फिर इस अंधविश्वास को दूर हटाते हुए और मन में हिम्मत जुटाते हुए आवाज दी-कौन हो,क्यों रो रही हो ?
मुझे अपने प्रश्न का उत्तर तुरन्त मिला। वह अदृश्य स्त्री बोली-मैं धरती माता हूँ,अपनी असहनीय पीड़ा से रो रही हूँ।
मैंने अदृश्य धरती माता को प्रणाम कर पूछा कि- आज आपको क्या कष्ट है ?,आज तो होली है। आपको खुश होना चाहिए,साथ ही आपकी संतान ने आज इतने तरक्की कर ली है कि वे चाँद तक पहुँच गए हैं,वायुयान का आविष्कार कर हवा में उड़ने लगे हैं,मरुस्थलों में भी पौधे उगाने लगे हैं…।
बात को बीच में ही रोकते हुए माता बोलीं -तुम लोग एक ही पहलू को देख रहे हो। दूसरा पहलू मैं तुम्हे बताती हूँ। आज बेशक तुम तरक्की कर लिए हो,पर कभी यह गौर किय़ा कि तुम लोगों ने घर,कल-कारखाने मन्दिर-मस्जिद,सड़क,रेलमार्ग आदि के निर्माण में कितने पेड़-पौधों को काट डाला है! इस तरक्की के कारण मेरे ऊपर से हरियाली को समाप्त करने की कगार पर हो। आज तुम होली मना रहे हो,पर क्या मुझमें वसंत की पर्याप्त सुगंधित हरियाली मौजूद है ! तुम एक ओर वायुयान से उड़ रहे हो,पर खतरनाक बमों का आविष्कार कर कभी आतंकी द्वारा तो कभी आतंकी को मारने के द्वारा मेरे शरीर को छल्ली कर रहे हो। आज तुम लोग इतना प्रदूषण बढ़ा चुके हो कि मुझे साँस लेने में तकलीफ होती है।
तुम शायद भूल गए हो ६ अगस्त १९४५ और ९ अगस्त १९४५ का वह दिन,जब तुम्हारी थोड़ी सी ही तरक्की ने हमारे शरीर पर (हिरोशिमा और नागासाकी)जो घाव दिए,वह आज भी सूख नहीं पाए हैं। आज भी वही माहौल बन रहा है। आज तुम यूक्रेन जाकर देखो,मेरा वह भाग किस कदर छल्ली हो रहा है। आज यदि फिर परमाणु का प्रयोग हो गया तो शायद मैं अपंग ही हो जाऊँगी।
बस माते मैं समझ गया,पर हम कर ही क्या सकते हैं ? मेरे अकेले के प्रयास से क्या हो सकता है ?
माता बोली-तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम्हें ज्ञात है कि वर्षा की बूंद-बूंद से ही तालाब,नदी और सागर का निर्माण होता है। इसी प्रकार एक-एक मानव के प्रयास से ही गाँव,जिला,राज्य,देश और अंततः विश्व (पृथ्वी) की स्थिति सुधर सकती है। इसके लिए तुम अधिकाधिक पेड़ पौधे लगाओ, आस-पास के वातावरण को साफ रखो,मन से काम,क्रोध,लोभ और मोह का त्याग कर पूरे विश्व में अमन-शान्ति का माहौल बनाओ। और हाँ,नि:स्वार्थ भाव से मत देकर एक योग्य सरकार बनाओ,जो मेंरे कष्टों को दूर करने का हर सम्भव प्रयास करे। ऐसा होने पर ही मैं होली मना पाऊँगी और वही तुम्हारे लिए सच्ची होली होगी।
मैंने प्रणाम कर कहा,-अवश्य माता हम ऐसा ही करेंगे। इस वर्ष रंगों को हाथ में लगाने से पूर्व ही कम से कम सभी एक-एक पेड़ अवश्य लगाएंगे एवं यह वादा करते हैं कि हम सभी मिलकर सच्ची होली ही मनाएंगे। अगर इन भावनाओं को आप तनिक भी समझ पाएं तो संकल्प लें कि हम सभी सदैव सच्ची होली ही मनाएंगे।

परिचय– साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव- लोहापिटटी में हैL जन्मतारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद हैL भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन(डिप्लोमा)की शिक्षा प्राप्त की हैL साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल हैL आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी(विद्यालय में शिक्षक) हैL सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैंL लेखन विधा-कविता एवं लेख हैL इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना हैL पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैंL विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।

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