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सच हमेशा कटु, असहनीय भी

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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महाराष्ट्र-राज्यपाल….

मनुष्य के मन में जितने भी विचार आते हैं उनको कोई पढ़ना जान ले तो वह किसी का भी दोस्त नहीं बन सकता है। कारण कि मन, वचन और कर्म का एकीकरण होना ही वचन है और तो वचन हितकारी हो, मितकारी हो और प्रिय हो, तो वह सत्य वचन कहलाता है। आज मनुष्य आपस में कितनी भी बकवास कर ले, पर वही बात यदि सोशल मीडिया में आ जाए तो गले की फाँस बन जाते हैं। दुनिया का सम्पूर्ण व्यापार शब्दों द्वारा ही होता है। आजकल एक छोटी-सी बात को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए जाने का चलन बढ़ता जा रहा है। तकनीकी ने जितना वरदान दिया, उससे अधिक अभिशाप दे दिया है।

सामाजिक, धार्मिक, व्यापारिक व साहित्यिक के साथ राजनीति में जो जितना बोलता है, वह उतना सफल माना जाता है, पर कभी व्यर्थ भाषण ‘जी का जंजाल’ बन जाता है। संसद में नित्य हर पल शब्दों के प्रहार हो रहे हैं, जिसका परिणाम किसी को अपमानित करना और किसी की प्रशंसा करना हो रहा है। पक्ष-विपक्ष की लड़ाई का मुख्य आधार शब्दजाल ही हैं, जिससे आपसी विसंगति बढ़ती है।
गत दिनों एक नेता ने ‘राष्ट्रपति’ को ‘राष्ट्रपत्नी’ कह दिया। बवाल खड़ा हो गया तो उससे फिर शब्द युद्ध शुरू हुआ, जो थमा नहीं। इसी क्रम में महाराष्ट्र के राज्यपाल ने सच कह दिया, जो बवाल का कारण बन गया। सच हमेशा कटु होता है, जो असहनीय लगता है। जब किसी मंच पर जाते हैं, तब वहां का माहौल ऐसा बन जाता है कि, कोई भी रौ में सच बोल जाता है, जो विवाद का विषय बन गया। उन्होंने अपनी बात किस सन्दर्भ में कही, पर बहुतेरों को बुरा लगा और बात यही नहीं; एक ने और बढ़ के बोल दिया कि यहाँ की कोल्हापुरी चप्पल भी प्रसिद्ध हैं! यानी शब्दों से मनुष्य की मनःस्थिति के साथ चारित्र पता चल जाता है। निरर्थक शब्दों से जो अपने श्रोताओं में उद्वेग लाता है, वह सबके तिरस्कार का पात्र होता है। जो निरर्थक शब्दों का आडम्बर फैलाता है, वह अपनी अयोग्यता को ऊँचे स्वर से घोषित करता हैं जैसे ईरानी। मुख से निकालने योग्य शब्दों का ही उच्चारण करना चाहिए, अर्थात निरर्थक-निष्फल शब्द मुख से नहीं निकालना चाहिए-
भाषण के जो योग्य हो, वह ही बोलो बात,
और न उसके योग्य जो, तज दीजे वह भ्रात।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।