कुल पृष्ठ दर्शन : 258

You are currently viewing सजनी का विरह

सजनी का विरह

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
******************************************

उफ़ ये बासंती बयार क्यों जियरा मेरा जलाये,
दूर बसे हैं साजन मेरे याद बहुत ही आये।

ये शीतल पुरवाई तन में कांटों-सी चुभती है,
अब मुझसे ये दर्द जुदाई और सही न जाये।

धुँधली पड़ी हाथ की मेहंदी अधर लालिमा फीकी,
रूठ गये चूड़ी-कंगना भी कज़रा बहता जाये।

वादा कर के गये साजना ये बसँत नहीं छूटे,
बाट देखते थके नयन अब धीरज छूटा जाये।

बागों का हर फूल खिल गया चटकी कलियां सारी,
दिन दिन बीते ये बसंत कब प्रीतम मुँह दिखलाये।

कसक रही अंगिया कैसे यौवन का भार संभालूँ ,
हूक उठे जियरा में जब भी कोयल तान लगाये।

छेड़ कर रही सखियाँ सारी नाम तेरा ले लेकर,
करें ठिठौली दर्द न समझें हरदम मुझे सताये।

ओ प्रियतम सुधि लो बिरहन की सुलग रही ये काया,
रात दिवस यादों में नैनाँ झर-झर नीर बहाये।

उठती है मन में उमंग इस मस्ताने फागुन की,
आकर गले लगा लो साजन वक्त न वापस आये॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

 

Leave a Reply