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सदा याद करें ज्ञात-अज्ञात महावीर-बलिदानियों को

राधा गोयल
नई दिल्ली
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२१ दिसम्बर से २७ दिसम्बर तक के इन्हीं ७ दिनों में गुरु गोविंद सिंह जी का पूरा परिवार बलिदान हो गया था। उसी रात माता गुजरी ने भी ठन्डे बुर्ज में प्राण त्याग दिए। यह सप्ताह भारत के इतिहास में ‘शोक सप्ताह’ होता है, शौर्य का सप्ताह होता है।
क्रिसमस के समय शराब में डूबने और जश्न मनाने की बजाए, यह सप्ताह उन बलिदानियों को याद करते हुए बिताएं।
पूस का १३वां दिन…जब नवाब वजीर खां ने फिर पूछा- “बोलो इस्लाम कबूल करते हो ?”
६ साल के छोटे साहिबजादे फ़तेह सिंह ने नवाब से पूछा- “अगर मुसलमान हो गए तो फिर कभी नहीं मरेंगे न ?”
वजीर खां अवाक रह गया।उसके मुँह से जवाब न फूटा तो साहिबजादे ने जवाब दिया कि, “जब मुसलमान हो के भी मरना ही है, तो अपने धर्म में ही अपने धर्म की खातिर क्यों न मरें ?”
तब दोनों साहिबजादों को ज़िंदा दीवार में चिनवाने का आदेश हुआ…। दीवार चिनी जाने लगी। जब दीवार फ़तेह सिंह की गर्दन तक आ गई तो ८ वर्षीय जोरावर सिंह रोने लगा। फतेह ने पूछा- “जोरावर रोता क्यों है ?” जोरावर बोला- “रो इसलिए रहा हूँ कि, आया मैं पहले था, पर धर्म के लिए बलिदान तू पहले हो रहा है।”
सबसे बड़ी बात… कि, उनको थोड़ा-थोड़ा काटा गया। फिर ईंटें चिनी गईं। दोनों साहिबजादों को थोड़ा- थोड़ा काटकर उसमें ईंटें चिनी गईं। कितनी भयानक यातना थी उन बच्चों के लिए, लेकिन उन्होंने अपना धर्म छोड़ना स्वीकार नहीं किया।
गुरु साहब का पूरा परिवार ६ पूस से १३ पूस… इस १ सप्ताह में कौम के लिए, धर्म के लिए, राष्ट्र के लिए बलिदान हो गया।
दोनों बड़े साहिबजादों, अजीत सिंह और जुझार सिंह जी का बलिदान दिवस…कि, दोनों चमकौर की लड़ाई में शहीद हो गए।
पहले पंजाब में इस हफ्ते सब लोग जमीन पर सोते थे, क्योंकि माता गुजरी ने २५ दिसम्बर की वो रात दोनों छोटे साहिबजादों के साथ नवाब वजीर ख़ाँ की गिरफ्त में सरहिन्द के किले में ठंडे बुर्ज़ में गुजारी थी और २६ दिसम्बर को दोनों बच्चे बलिदान हो गए थे। २७ को माता ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे। आइए, उन सभी ज्ञात-अज्ञात महावीर-बलिदानियों को याद करें, जिनके कारण आज सनातन संस्कृति बची हुई है।

हम क्रिसमस तो बहुत धूमधाम से मनाते हैं, लेकिन जो धर्म के लिए बलिदान हो गए, उनके बारे में कुछ नहीं जानते।