राधा गोयल
नई दिल्ली
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मौन संघर्ष, हाथों में छाले, सम्मान कब ? (मजदूर दिवस विशेष)….
संघर्ष रात-दिन किया, मगर वो मौन रहा,
अपनी पीड़ा को कभी किसी से नहीं कहा
परिवार का पालन करने को, दिन- रात काम में जुटा रहा,
तपती हुई भीषण गर्मी में वो ईंट और गारा ढोता रहा।
भीषण शीत-ताप सह, भवन बनाने में संलग्न रहा,
पैरों में बिवाई हाथों के छालों की पीड़ा सहता रहा
इतनी मेहनत करने के बाद, दो जून की रोटी नहीं मिले,
सिर पर छप्पर भी नहीं, फिर भी जीवन से उसको नहीं गिले।
परिवार का पालन करने को संघर्ष किया, पर मौन रहे,
हाथों में छाले, पैरों की बिवाई की पीड़ा किससे कहे ?
जिस अमीर का महल बना, उसको बेहद सम्मान मिला,
श्रमिकों को नजरअंदाज किया, मेहनत का कैसा सिला मिला।
श्रमिकों के हाथों में छाले क्या कभी किसी को दिखते हैं ?,
संघर्ष मौन रहकर करते, पर किसी से कुछ नहीं कहते हैं
न भूलो उनके कारण ही निर्माण कार्य सारे होते,
फिर भी क्यों मेहनतकश लोगों को, रोटी के टोटे रहते ?
वो जिनके हाथों में छाले हैं, पैरों में बिवाई है,
तेरे अरमान की बस्ती उन्होंने ही बनाई है।
भोजन की कमी ना रहे कभी, पूरी मजदूरी दो उनको।
सम्मान के अधिकारी हैं वो, थोड़ा सम्मान भी दो उनको॥