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सम्मान

प्रो. लक्ष्मी यादव
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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राजीव शहर का प्रसिद्ध बिज़नेसमैन था। अपार धन सम्पति थी, कमी थी तो संस्कार, सभ्यता और मानवता की। छोटा हो या बड़ा, वह किसी को कुछ न समझता। यहाँ तक कि, इसी घमंड में ऑफिस के गार्ड को एक दिन थप्पड़ मार दिया, क्योंकि ‘ऑन ड्यूटी’ पर गलती से उसकी आँख लग गई थी। खैर, बात आई-गई हो गई।
एक दिन राजीव ऑफिस के काम में इतना व्यस्त हो गया कि, उसे समय का पता ही नहीं चला, शाम हो गई। ऑफिस के सभी कर्मचारी अपने-अपने समय पर घर के लिए निकल गए, लेकिन राजीव नहीं गया। उसे अगले दिन की मीटिंग की तैयारी जो करनी थी। देखते-देखते रात के १२ बज गए, राजीव घर नहीं गया। समय बीतता गया। ऑफिस का गार्ड इंतज़ार कर रहा था कि, साहब निकलते तो उसे भी घर जाने को मिलता। बहुत रात हो चुकी थी। अचानक पूरी बिल्डिंग की लाईट चली गई। गार्ड बहुत डर गया, करे तो क्या करे ? उसने जाकर बिज़ली का तार चेक किया। देखा तो तार टूटा था। उसने तार जोड़ा और राजीव के कैबिन की तरफ गया। जैसे ही देखा तो ज़ोर से चीखा ‘साहब…ये क्या हुआ साहब…?’ उसे उठाने की कोशिश कर रहा था, पर राजीव नहीं उठा, वह बेहोश था। गार्ड डर गया, क्योंकि ऑफिस में उन दोनों के सिवाय कोई और था ही नहीं। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे ! जैसे-तैसे अपने-आपको सँभाला तथा हिम्मत कर एम्बुलेंस वाले को फ़ोन किया और अस्पताल ले गया। कुछ समय के बाद राजीव को होश आया। होश में आते ही राजीव ने चिकित्सक से पूछा “डॉक्टर सा.! मैं अस्पताल कैसे पहुँचा” ?
चिकित्सक ने सारी बातें राजीव को बताई कि, आज आपको जीवन मिला है, वह आपके गार्ड की वजह से। यह सब सुनकर राजीव एक पल के लिए गहरी सोच में खो गया और उसे अपने किए पर बड़ा पछतावा होने लगा। उसे अहसास हुआ कि, जीवन में प्रत्येक मनुष्य का अपना एक महत्व होता है। चाहे गरीब हो या अमीर, कोई भी हो, सबको आदर सम्मान दो। सबसे विनम्रता से बात करो, कब कौन किसके काम आएगा, वह किसे पता! अब राजीव बदल गया था।