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सांख्य दर्शन:बाह्य जगत् के साथ सूक्ष्म विश्लेषण भी

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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भारतीय दार्शनिक परम्परा में सांख्य दर्शन को अत्यन्त प्राचीन, तर्कप्रधान और विश्लेषणात्मक दर्शन माना जाता है। ‘सांख्य’ का सामान्य अर्थ है—तत्त्वों का सम्यक् ज्ञान अथवा गणना। महर्षि कपिल को इसका आदि प्रवर्तक माना जाता है। सांख्य का मूल प्रयोजन केवल जगत् की व्याख्या करना नहीं, बल्कि मनुष्य को दुःखत्रय से आत्यन्तिक निवृत्ति का मार्ग दिखाना है। परम्परा में इसके सूत्ररूप सिद्धान्तों का विकास आगे चलकर सांख्यकारिका जैसे ग्रन्थों में व्यवस्थित हुआ।
सांख्य का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त द्वैतात्मक तत्त्व मीमांसा है। इसके अनुसार २ मूल, अनादि और स्वतन्त्र तत्त्व हैं—प्रकृति और पुरुष। प्रकृति जड़, परिवर्तनशील और त्रिगुणात्मक है, जबकि पुरुष चेतन, साक्षी, निष्क्रिय तथा अनेक हैं। प्रकृति में सत्व, रजस् और तमस् तीन गुणों की साम्यावस्था रहती है। पुरुष की सन्निधि में प्रकृति की साम्यावस्था भंग होती है और सृष्टि-क्रम विकसित होता है।
सांख्य २५ तत्त्वों का प्रतिपादन करता है—प्रकृति, महत्, अहंकार, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, मन, ५ तन्मात्राएँ, ५ महाभूत और पुरुष। यहाँ महत् से बुद्धि का तथा उससे अहंकार का विकास माना गया है। अहंकार से मन, इन्द्रियाँ और सूक्ष्म तत्वों का क्रमिक प्रस्फुटन होता है। इस प्रकार सांख्य बाह्य जगत् के साथ-साथ मन, बुद्धि और अहंकार की संरचना का भी सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
  वैदिक-उपनिषद् परम्परा में सांख्य के अनेक मूल भावों की पूर्वपीठिका दिखाई देती है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में ‘अजा’ और ‘भोक्ता-भोग्य-प्रेरिता’ जैसे विचारों के माध्यम से प्रकृति और चेतन सत्ता के सम्बन्ध पर विचार मिलता है। भगवद्गीता में ‘सांख्य’ और ‘योग’ का बार-बार उल्लेख है तथा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, गुणत्रय और प्रकृति-पुरुष सम्बन्ध की चर्चा सांख्य-विचार से गहरे रूप में जुड़ती है। हालांकि, उपनिषदों, गीता और शास्त्रीय सांख्य के बीच पूर्ण दार्शनिक समानता मानना उचित नहीं; उनके प्रतिपादनों में महत्वपूर्ण भेद भी हैं।
सांख्य की विशेषता यह है कि वह अविवेक को बन्धन और विवेकज्ञान को मुक्ति का साधन मानता है। पुरुष जब स्वयं को प्रकृति के विकार—शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार और सुख-दुःख से पृथक् साक्षीस्वरूप जान लेता है, तब प्रकृति के साथ उसका तादात्म्य समाप्त होता है। यही अवस्था कैवल्य है।
आधुनिक जीवन में भी सांख्य की प्रासंगिकता स्पष्ट है। मनुष्य प्रायः शरीर, पद, संपत्ति, भावनाओं और विचारों को ही अपना सम्पूर्ण स्वरूप मानकर तनाव और आसक्ति में फँसता है। सांख्य का विवेक उसे यह समझने की दृष्टि देता है कि अनुभव और अनुभवकर्ता में भेद है। गुणों के स्वभाव को समझना आत्मसंयम, संतुलन और आत्मनिरीक्षण को पुष्ट कर सकता है।
अतः, सांख्य दर्शन केवल प्राचीन तत्वों की गणना नहीं, बल्कि दुःख के कारण की खोज, चेतना की पहचान और विवेकपूर्ण जीवन की दार्शनिक साधना है। प्रकृति को समझते हुए पुरुष के साक्षीस्वरूप को पहचानना ही उसके दर्शन का सार है; और यही विवेक मनुष्य को अन्ततः कैवल्य की ओर ले जाता है।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥