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सावन बरसे झर-झर…

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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सावन बरसे झर-झर-झर,
तरुवर से बूंदें गिरती छनकर
छाई घटा घनघोर गगन में,
छिप से गए हैं शशि दिनकर।

चमक रही तड़ित जलधर में,
हृदय कांप रहा ज्यों जलकर
चल दिए घन बावरे होकर,
अपने तन में जल भरकर।

मन में जगी आस मिलन की,
एक हो प्रणय सूत्र में बंधकर
पुलकित यौवन हर्षित तन-मन,
महक रहा ज्यों पुष्प निकल कर।

चमक उठे इन्द्रधनुष के रंग,
दिल में एक नई उमंग लेकर
कल-कल करते झरनों के स्वर,
निकल पड़े विरह गीत बनकर।

कोयल मोर पपीहा बोले,
दादुर भी करने लगे टर्र-टर्र
प्रणयातुर पंछी आ बैठे हैं,
अपने नीड़ से निकलकर।

देखो मौसम आया मन भावन,
सावन गाएं सब मिलकर।
मौसम ने भी ले ली अंगड़ाई,
सबके दिल में रंग भर कर॥

परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।