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साहित्य उत्सव में विचार-कवि गोष्ठी संग कई पुस्तकें लोकार्पित

पटना (बिहार)।

नवरस स्कूल आफ परफॉर्मिंग आर्ट्स, इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट तथा बिहार म्यूजियम संग्रहालय (पटना) के संयुक्त तत्वावधान में साहित्यिक सांस्कृतिक उत्सव ‘अहद-अनहद’ द्वारा ‘साहित्य उत्सव-ए फेस्टिवल ऑफ वर्ड्स एंड परफार्मेंसेस’ संग्रहालय के सभागार में आयोजित किया गया। इसमें कवि गोष्ठी संग अनेक पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।
इस उत्सव का उद्घाटन प्रसिद्ध पत्रकार व्योमेश शुक्ला, डॉ. अजीत प्रधान, ए.एन. शर्मा तथा उत्सव निदेशक सुजाता प्रसाद द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। बिन्देश्वर प्रसाद गुप्त (पटना, बिहार) ने बताया कि, ‘लो फिर बसंत आई’ किस्सागोई को अमीर खुसरो और फैज आदि से प्रेरित हो एक अनूठे गीतात्मक अंदाज में मशहूर गायिका रेने सिंह, लेखिका कवि और योजना आयोग की भूतपूर्व सदस्या सईदा हमीद एवं फनकार मनु सिकंदर ने अपने दमदार प्रयोग से प्रस्तुत करते हुए पूरे माहौल को संगीतमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन्होंने “दिल आजमाने के दिन आ रहे हैं” आदि सुनाई।
उत्सव के दूसरे-तीसरे दिन वैचारिक सत्रों में चिंतन और साहित्य, पुस्तकों का लोकार्पण, लेखकों से वार्ता, पुस्तक की समीक्षा, कवि गोष्ठी आदि कार्यक्रमों का दौर चलता रहा। सुप्रतिष्ठित लेखिका पद्मश्री उषा किरण खान की संस्मरण पुस्तक ‘दिनांक के बिना’ के लोकार्पण पर पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार अनीश अंकुर ने उषा खान से बातचीत की। यह पुस्तक उषा खान के साथ विभिन्न लब्धप्रतिष्ठित राष्ट्रीय साहित्यकारों नागार्जुन, रविंद्र कालिया, प्रो. वीणा श्रीवास्तव, प्रभाष जोशी, मृदुला सिन्हा आदि से अंतरंग वैचारिक संबंध भी स्थापित करती है।

उत्सव में ऋषिकेश सुलभ द्वारा आशुतोष भारद्वाज की पुस्तक ‘मृत्यु कथा’ सहित हिंदी साहित्य क्षेत्र के २ अग्रदूतों अज्ञेय और निर्मल वर्मा की जीवनी पर आधारित ‘स्मृति और आख्यान’ का भी विमोचन हुआ। बिहार के पूर्व मुख्य सचिव और फिल्म समीक्षक त्रिपुरारी शरण ने इस पर लेखक से बातचीत की। इसके अलावा वैचारिक सत्रों में ‘समिधा:अराजकता से निकलती आवाजें के अंतर्गत साहित्य में महिला आवाजों की शक्ति’ पर पद्मश्री खान, वंदना राग, गीताश्री सविता सिंह, चिंकी सिन्हा और अजीत कुमार झा ने चर्चा में भाग लिया। सत्र का संचालन व्योमेश शुक्ल ने किया।

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