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सृजन का दीप जले दिन-रात

तारा प्रजापत ‘प्रीत’
रातानाड़ा(राजस्थान) 
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कैसे भी हों चाहे हालात,
सृजन का दीप जले दिन-रात।

जीवन में हज़ार कुंठाएँ हों
या फिर चिन्ताओं का तूफ़ान,
कभी ना छोड़ो ईश्वर का हाथ…
सृजन का दीप जले दिन-रात।

कभी जो हो जाओ अकेले
कोई न हो तेरा अपना-पराया,
हर क़दम पे तेरे सच है साथ…
सृजन का दीप जले दिन-रात।

हर पल तुम मुस्कराते रहना
ख़ुशियों की बारात मिले चाहे,
मिले गम की तुझको सौगात…
सृजन का दीप जले दिन-रात।

होगी सुबह सूरज निकलेगा
कब तक रहेगा ये अंधकार,
होगा जरूर एक दिन प्रभात…
सृजन का दीप जले दिन-रात।

कल है नाम काल का समझे
भूल कर हम अतीत की बातें।
करें आज हम आज की बात…
सृजन का दीप जले दिन-रात॥

परिचय– श्रीमती तारा प्रजापत का उपनाम ‘प्रीत’ है।आपका नाता राज्य राजस्थान के जोधपुर स्थित रातानाड़ा स्थित गायत्री विहार से है। जन्मतिथि १ जून १९५७ और जन्म स्थान-बीकानेर (राज.) ही है। स्नातक(बी.ए.) तक शिक्षित प्रीत का कार्यक्षेत्र-गृहस्थी है। कई पत्रिकाओं और दो पुस्तकों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं,तो अन्य माध्यमों में भी प्रसारित हैं। आपके लेखन का उद्देश्य पसंद का आम करना है। लेखन विधा में कविता,हाइकु,मुक्तक,ग़ज़ल रचती हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण होना है।