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स्वतंत्रता:नैतिकता और देशभक्ति की बहुत जरुरत

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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चिंतन….

स्वतंत्रता की भूमिका हमारे देश में १८५७ से शुरू हुई थी, जिसमें मंगल पांडेय, झाँसी की रानी जैसे हजारों लोगों ने अपने जीवन का बलिदान दिया था। उस समय एक ही लक्ष्य था कि, हमें गुलामी की जंजीरों से मुक्त होना है। अथक प्रयास और कुर्बानियों का सिलसिला चला जा रहा था। बंगाल के साथ जहाँ-जहाँ भी शिक्षा केंद्र थे, वहाँ से ज्ञान अर्जन कर अपनी स्थिति समझकर लोग विरोध करते रहे। जैसे-जैसे नए युवकों का प्रादुर्भाव हुआ, चेतना का सञ्चालन हुआ और आंदोलन में गति आई। १८८५ में कांग्रेस का गठन होकर एक मंच पर सबका आना शुरू हुआ। उसमें से बहुत से नवयुवक व बुद्धिजीवीजन जुड़े और एक मंच मिलकर आंदोलन को बल दिया गया। उस दौरान सबमें आत्मबल के साथ जोश था, सब देश के लिए कुर्बान होने को तत्पर रहे और लाखों लोगों ने अनाम योद्धा बनकर कुर्बानी दी। उनका मात्र एक लक्ष्य था गुलामी से मुक्ति और स्वराज्य की कल्पना। उस दौरान उन्होंने न परिवार देखा, न समाज, केवल देश, इसके अलावा कोई विकल्प नहीं और उस कसौटी पर खरे भी उतरे। जैसे ही देश स्वतंत्र हुआ, उस समय गरीबी, भुखमरी अशिक्षा, बेरोजगारी आदि बहुत थी यानी विकास एक प्रकार से शून्य था। तत्कालीन नेताओं और सरकारों ने बहुत मेहनत की, नई योजनाएं लाए, औद्योगिक क्रांति के साथ बड़े बाँध बनाए गए। जैसे-जैसे विकास के कदम उठाए गए, वैसे ही २ युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता के कारण विकास कम हो पाया। देश में स्वतंत्रता के कारण स्वच्छंदता का वातावरण बनने से नए नेताओं का जन्म हुआ, जो छात्र जीवन से, कोई जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से सत्ता के विकेन्द्रीकरण से पंच-सरपंच, पंचायत, विधायक सांसद और मंत्री बनने से पैसों के लालच ने कुछ भी निम्न स्तरीय काम करने का अवसर मिला। इसी बीच उद्योगपतियों की होड़ ने विलासिता को जन्म दिया तो अर्थ के कारण सब अनर्थ करने लगे। पहले गिने-चुने भ्रष्ट मिलते थे, आज इने-गिने ईमानदार मिलते हैं।

देश में राजनीतिक अस्थिरता के कारण चारित्रिक गिरावट राजनीति के साथ अफसरशाही में आई और फिर तो पैसे बटोरने की अंधी दौड़ शुरू हुई। जैसे विकास की गति बढ़ी, वैसे-वैसे विनाश भी शुरू हुआ। उसके बाद काला धन विदेशों में जमा किया जाने लगा। मंहगाई ने गगनचुम्बी छलांग लगाना शुरू किया। बेतहाशा धन आने से बहुत विकास हुआ, पर एक बात यह समझ में आई कि, जितने हम आज़ादी में युवा से वृद्धावस्था में पहुँच रहे हैं, उतनी धन लोलुपता के कारण हम जितने विकासशील होना चाहिए थे, नहीं हो पाए। भ्रष्टाचार और अनैतिकता के घुन ने देश को खोखला भी कर दिया। अब जब गंगोत्री ही अपवित्र है, तो गंगा कहाँ तक पवित्र होगी ? ऐसा नहीं है कि, हमने विगत वर्षों में विकास नहीं किया, बहुत किया जबकि उससे भी अधिक हो सकता था। इसका मूल कारण है कि, सामाजिक ढांचा बिगड़ चुका है। हम दूसरों से अपेक्षा रखते हैं, पर स्वयं आत्मनिरीक्षण करने की फुर्सत नहीं है। हम कितने भी विकसित हो जाएँ, जब तक व्यक्तिगत, सामाजिक नैतिक, धार्मिक तथा चारित्रिक सुधार नहीं होगा, तब तक सही अर्थों में विकसित नहीं हो पाएंगे। आज सब कुछ होते हुए भी व्यक्ति अशांत है, कारण कि आज भी मौलिक सुविधाओं से वंचित हैं। आज शिक्षा-चिकित्सा के क्षेत्र में समुन्नत नहीं हो पाए हैं। इसलिए आज देश को नैतिकता और देशभक्ति की बहुत जरुरत है। आज देशवासी स्वकेन्द्रित होकर अपने हितार्थ काम कर रहे हैं, कारण जब शासक अपने क्रिया-कलाप में नैतिकता का स्थान नहीं रखते, तब अन्य से क्या अपेक्षा की जाए। राजनीति में कैसे सत्ता पाई जाए और अन्यों को नेस्तनाबूद किया जाए, चल रहा है जिस कारण देश में प्रजातंत्र या लोकतंत्र कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। आज आलोचना का कोई स्थान नहीं है। आलोचक देशद्रोही माने जाने लगे है। सरकार का बेरोजगारी, मँहगाई पर कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसा लग रहा है कि, कोई किसी की नहीं सुन रहा है। संसद और विधानसभा औचित्यहीन होती जा रही है। कोई मर्यादा नहीं, कोई इज़्ज़त नहीं। जिससे देश शिक्षित होता है, वह अराजकता का अड्डा बना हुआ है।
हमने उतनी गंभीरता-प्रौढ़ता पाई या अभी भी आजादी के पहले जैसे संघर्ष की जरूरत है। जब तक ईमानदारी, देशभक्ति व नैतिकता जीवन में नहीं आएगी, तक तक विकास जड़ तक नहीं पहुंचेगा। सोचना चाहिए कि, बिना नींव का महल कब तक टिकेगा ?

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।