स्वागतम् अभिनन्दनम्

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डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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दुर्दीन पीड़ अवसादित मन,
दुर्गम राहें बढ़ पायी हैं।
जो धीर-वीर संयम साहस,
द्रौपदी सबल बन पायी हैं॥

अछूत वर्ग आदिवासी कुल,
कुलदीप बनी मुस्कायी है।
संघर्ष मूर्ति बाधक जेता,
शिक्षा ज्ञान समर जय पायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

वह नार्यशक्ति प्रति मानक नित,
शिक्षिका सुयश रच पायी हैं।
राजनीति सुपथ सोपान शिखर,
चातुर्य शौर्य पा छायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

विधायक मंत्री जनसेवक,
राज्यपाल स्वर्ण यश गायी हैं।
सच्चरित्र मृदुल संस्कार विनत,
जन मीत-प्रीत बन भायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

विश्वास स्वयं विश्वास वतन,
संताप सहन कर पायी हैं।
कुलदीप युगल खो मर्माहत,
पति काल ग्रास सह पायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

नित नारी हिय संकोच मुदित,
देशार्थ स्वयं दे पायी है।
दलित पीड़ित अवसाद ग्रसित,
मुस्कान खुशी दे पायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

विश्वास वतन हिय जनमानस,
सरकार केंद्र मन भायी है।
पद लोकतंत्र सर्वोच्च शिखर,
प्रत्याशी सहज बन पायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

यकीन वतन भारत जन-मन,
चहुँ देश समर्थन पायी हैं।
संथाल सुता तनया उत्कल,
राष्ट्र महामहिम बन छायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

वह नार्यशक्ति अब राष्ट्र प्रधान,
रायसीना जय कर पायी हैं।
बन राष्ट्रपति गणतंत्र वतन,
तिहुँ सेना प्रधान बन आयी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

महिला सशक्ति अधिपति भारत,
नारी सम्मान बढ़ाई हैं।
रच कीर्ति पताका नव उड़ान,
साफल्य क्षितिज मुस्काई हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

अरमान राष्ट्र सम्मान सुयश,
चहुँ प्रगति आश गढ़ आयी हैं।
नव शौर्य सबल सीमांत विजय,
सेनापतित्व राष्ट्र दे पायी हैं।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

अभिनंदन स्वागत पावन क्षण,
द्रौपदी राष्ट्रपति बन आयी है।
फिर से द्वापर याज्ञसेनि बन,
कुरुक्षेत्र विजय यश पायी है।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

राष्ट्र पति पद स्वर्णिम गौरव,
नव आश किरण नभ छायी है।
आदिवासी नार्य अस्मिता,
अरुणिम गाथा रच पायी है।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

आओ स्वागत करें जन वतन,
द्रौपदी अश्वमेध जय पायी है।
करो आरती मातु भारती,
सत् धर्म विजय हर्षायी है।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…

नवनिर्वाचित महामहिम जी,
द्रौपदी मुर्मू अभिनन्दन है।
ध्वजा तिरंगा शान देश का,
स्वागत राष्ट्रपति नूतन है।
दुर्दीन पीड़ अवसादित मन…॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥