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खुशी का पता

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड) 
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मैं निकला खुशी ढूंढने,
ढूंढते-ढूंढते मिला एक नेता
सोंचा इसके पीछे सारी जनता,
यही होंगे सच में खुशी के देवता।

पर देखा गद्दी पर बैठा था उदास,
माथे पे चिंता की गहरी लकीर खास
पिछला चुनाव तो जीत लिया था,
अगले चुनाव का डर सता रहा था।

उसे छोड़कर मैं और आगे बढ़ा,
देखा दूर एक अमीर व्यवसायी खड़ा
सोंचा जहां में यह है सबसे अमीर,
इन्हीं के पास अवश्य खुशी की जागीर।

पास गया तो पाया सूना-सा मंजर,
सोने के महल में बैठा था वह बंजर
चिंतित हो बोला उसने क्या बताऊँ,
पैसा तो है पर सुकून कहाँ से लाऊँ ?

आगे बढ़ा तो मिला किसान का घर,
कठिन परिश्रम का जीवन था उस पर
पूछा-बाबा आप तो रहते होंगे खुश,
बोला-कर्ज, सूखा, बाढ़ से भारी दु:ख।

थक-हार कर लौटा मैं अपने घर,
माँ बैठी थी आँगन में चटाई पर
चेहरे में झुर्रियाँ, पर आँखों में नूर,
गोद में गीता, होंठों पे सच्चा सुर।

चिंतित देखते ही बोली माँ हँसकर,
खुशी न महल में, न सत्ता में बसती
न खेत में उपजती, न बैंक में पलती,
यह संतोषी मन में खुद ही खिलती।

कल की चिंता छोड़कर जो,
जो मिला उसी में मुस्कुराए
दु:ख में भी जो प्रभु को ध्याए,
खुशी केवल उसी मन में छाए।

कहता ‘राजू’ मत भटक बाहर इतना,
तेरे अंदर ही बहता खुशी का झरना।
संतोष, दया और प्रेम का भाव जगा,
यही है जीवन में खुशियों का धागा॥

परिचय-साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव-लोहापिटटी में है। जन्म तारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद है। भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल है। आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी (विद्यालय में शिक्षक) है। सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैं। लेखन विधा-कविता एवं लेख है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैं। विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।