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हमें विचारशील बनाती हैं किताबें -संतोष चौबे

भोपाल (मप्र)।

दिमाग को क्रियाशील बनाए रखने के लिए किताबें पढ़ना बहुत आवश्यक है। वर्तमान समय में बाजार ने टेक्नोलॉजी के माध्यम से हमारी एकाग्रता को पूरी तरह से भंग कर हमारे दिमाग को गुलाम बना लिया है। अब बाजार अपने तरीकों से हमें संचालित कर रहा है। ऐसे में हमारे जीवन में किताबों का महत्व और अधिक हो जाता है। हमें विचारशील बनाती हैं।
       यह महत्वपूर्ण उद्गार वरिष्ठ कथाकार एवं कुलाधिपति (रबीन्द्रनाथ टैगोर विवि, भोपाल) संतोष चौबे ने नरेश बाथम के ग़ज़ल संग्रह ‘अनकही’, श्रीमती मनोरमा पंत के लघुकथा संग्रह ‘आसपास’ एवं डॉ. मालती बसंत की शोध पुस्तक ‘सदगुरु कबीर और मानवता’ के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किए। आईसेक्ट पब्लिकेशन, वनमाली सृजन पीठ एवं स्कोप ग्लोबल स्किल्स विवि (भोपाल) का यह आयोजन ‘शारदा सभागार’ (स्किल्स विवि, भोपाल) में समारोह पूर्वक किया गया। श्री चौबे ने रचनाकार नरेश बाथम के ग़ज़ल, नज़्म, गीत संग्रह ‘अनकही’ पर कहा कि नरेश बाथम ने बहुत अच्छी ग़ज़लें लिखीं हैं। उन्होंने नरेश बाथम की छोटी बहर की ग़ज़ल का उम्दा पाठ भी किया।
   मनोरमा पंत के संग्रह पर कहा कि वे संवेदात्मक काम करती हैं। मनोरमा जी अपने लेखन के माध्यम से नई चीजों की तलाश करतीं हैं। उन्होंने मनोरमा पंत की लघुकथा ‘पिघलते सपने’ का बहुत ही भावनात्मक पाठ भी किया।
    मुख्य अतिथि मुकेश वर्मा, (प्रतिष्ठित कथाकार एवं अध्यक्ष- वनमाली सृजन पीठ) ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आपको ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ना चाहिए।
   इस अवसर पर लेखक श्री बाथम ने अपनी पुस्तक पर विचार रखते हुए चुनिंदा ग़ज़लों का बेहतरीन पाठ भी किया। वरिष्ठ साहित्यकार घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ ने ‘अनकही’ पुस्तक पर समीक्षात्मक उद्बोधन दिया।
मनोरमा पंत और डॉ. बसंत ने भी लेखकीय वक्तव्य दिया।
       समारोह का संचालन महीप निगम (वरिष्ठ प्रबंधक-आईसेक्ट पब्लिकेशन) ने किया।