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हवाई हमला,वयं पंचाधिकम् शतम्

राकेश सैन
जालंधर(पंजाब)
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अर्थात् हम सौ और पांच नहीं,एक सौ पांच हैं। अपने मुखिया की कन्या से दुर्व्यवहार के बाद गंधर्वों द्वारा दुर्योधन को बंदी बनाए जाने का समाचार सुनते ही धर्मराज युधिष्ठिर अपने अनुज भीम को उसे मुक्त करवाने का आदेश देते हैं। कौरवों की दुष्टता का संदर्भ देते हुए भीम जब गांधारी नंदन दुर्योधन के प्रति इस उदारता का औचित्य पूछते हैं तो कुंती श्रेष्ठ कहते हैं-‘वयं पंचाधिकम् शतम्’ अर्थात परिवार में कितने भी आपसी मतभेद हों,परंतु बाहर के लोगों के लिए वे एक ही हैं। पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान स्थित आतंकी अड्डों पर हुई एयर स्ट्राईक(वायु सेना का हवाई हमला) के बाद देश का राजनीतिक वर्ग जिस तरह बंटा हुआ नजर आ रहा है,वह केवल दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं,बल्कि आतंकवाद व दुश्मन देश के खिलाफ हमारी लड़ाई को कमजोर करने वाला भी है। एयर स्ट्राईक के बाद पहले तो देश के सभी राजनीतिक दल सरकार के साथ एक सुर में बोलते दिखे, परंतु जल्द ही गाते-गाते चिल्लाने की मुद्रा में आ गए। विचित्र विरोधाभास है कि आतंक के खिलाफ पूरी दुनिया भारत के साथ खड़ी है परंतु भारत आंतरिक तौर पर अपने-आपसे लड़ता नजर आ रहा है। जैसा कि वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल बीएस धनोआ व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं और सीमा पार संकेत भी मिल रहे हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अभी जारी है,परंतु बिना अंदरूनी एकता के इसे जीत पाना बहुत मुश्किल होगा।
एयर स्ट्राईक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस कार्रवाई की सराहना और सेना का अभिनंदन किया परंतु कुछ समय बाद ही उनकी जुबान उस समय फिर गई जब उन्होंने २१ विपक्षी दलों की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सेना के राजनीतिकरण के आरोप मढ़े। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में सेना की सफलता को अपनी बता रहे हैं और इसका चुनावी लाभ लेना चाहते हैं। सेना पर गौरव जताना, आतंकवाद व बदनीयत पड़ौसी को चेतावनी देना सेना का राजनीतिकरण कैसे हो गया,यह समझ से परे की बात है। ऐसा करके मोदी अपने संवैधानिक दायित्व का ही पालन कर रहे हैं। क्या संकट की घड़ी में सेना के साथ खड़ा होना उसका राजनीतिकरण माना जाना चाहिए ? पुलवामा हमले,सेना की जवाबी कार्रवाई व इसके बाद भारत को मिली विश्वभर में कूटनीतिक जीत से देशभर में राष्ट्रभक्ति का ज्वार है। लोग स्वस्फूर्त रूप से इसका प्रदर्शन भी कर रहे हैं,जगह-जगह हो रहे प्रदर्शनों में भारत माता की जय, वंदे मातरम् के जयघोष लग रहे हैं तो इससे विपक्ष में घबराहट क्यों फैल रही है ? कांग्रेस इस तरह के नारे लगाने वाले को अपना विरोधी मानती है तो उसका या तो वैचारिक दिवालियापन है या अतीत में की हुई भूलें व अपराध, जो देशभक्ति के दर्पण में उसे डराने लगे हैं। राहुल गांधी जब जेएनयू में टुकड़े-टुकड़ेवादी लोगों के साथ खड़े होंगे और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कांग्रेस वंदे मातरम् के विरोधियों का साथ देगी तो देशभक्ति के नारे स्वभाविक तौर पर ही दल को डराएंगे ही और यह नारे लगाने वाले अपने विरोधी ही तो लगेंगे। इस हालत में कांग्रेस को दूसरों पर कीचड़ उछालने की बजाय अपनी पीढ़ी के नीचे मूसल घुमाकर देखना चाहिए।
सेना को लेकर राजनीतिक घमासान की आग तो राहुल गांधी ने लगाई,परंतु इसको प्रचंड रूप देने का काम किया दिग्विजय सिंह ने। इन्होंने न केवल पाकिस्तान के बालाकोट में हुए हवाई हमले के न केवल सबूत मांगे,बल्कि पुलवामा में हुए आतंकी हमले को दुर्घटना भी बता दिया। कांग्रेस आका को सावधान हो जाना चाहिए,क्योंकि यह वही दिग्विजय सिंह हैं जो मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले खुद ही स्वीकार कर चुके हैं कि वे जब-जब बोलते हैं,तब-तब कांग्रेस के वोट कटते हैं। उनका यह आत्मज्ञान सही भी साबित हुआ है,क्योंकि विधानसभा चुनाव में वह मौन रहे तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी को जीत भी मिल गई। अब फिर उनका श्रीमुख खुल गया है,कांग्रेस को अपनी खैर मनानी चाहिए। कांग्रेस को ज्यादा चिंतित इसलिए भी होना चाहिए कि उसकी पनौती दशानन का रूप धर रही लगती है। पहले तो नाव में छेद करने का काम केवल दिग्गी राजा की जुबान से ही होता था,अब तो उनको पार्टी के बुद्धिजीवी शशि थरूर,पी. चिदंबरम,वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और पंजाब के दादुरवक्ता नवजोतसिंह सिद्धू का भी साथ मिल चुका है। यानि हर शाख पर दिग्विजय ही दिग्विजय बैठे दिखने लगे हैं।
जैसे पुलवामा हमले को राजनीति से नहीं जोड़ा जा सकता,परंतु यह तथ्य भी उतना ही सत्य है कि आतंकवाद फैलाने के साथ-साथ इसका एक उद्देेश्य राजनीतिक भी है। सभी जानते हैं कि देश विरोधी ताकतों,आतंकी संगठनों व जिहादी तंजीमों को नरेंद्र मोदी फूटी आँख नहीं सुहाते। हमले का समय चुनने वाली देश विरोधी ताकतें इसके जरिए मोदी को राजनीतिक रूप से भी कमजोर करना चाहती थीं। इसका एक उद्देश्य यह भी था कि चुनावों के समय हमला कर मोदी सरकार को आतंकवाद ,पाकिस्तान, कश्मीर के मोर्चों पर असफल साबित किया जाए,परंतु प्रधानमंत्री ने कड़ा कदम उठाकर पूरे खेल को उलट दिया। प्रधानमंत्री का यह पूछना भी सही है कि अगर एयर स्ट्राईक में थोड़ी चूक हो जाती या भारत को थोड़ी-सी भी असफलता हाथ लगती तो क्या विपक्ष इसके लिए उनसे इस्तीफे की मांग नहीं करता ? स्वाभाविक तौर पर विरोधी ऐसा करते और यह करने का उन्हें अधिकार भी होता। यह ठीक है कि दुश्मन के साथ सेना ही लड़ती है,खेत में हल किसान ही चलाता है,उद्योगों को उद्योगपति संचालित करते हैं और प्रशासनिक कामों को अधिकारी ही अंजाम देते हैं,परंतु इनकी सफलता या असफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व ही जिम्मेवार माना जाता है। कांग्रेस क्यों भूलती है कि १९७१ के भारत-पाक युद्ध में जीत का श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मिला था और सदन में सभी ने खड़े होकर उनका अभिनंदन किया। उस समय भी तो सेना ही लड़ी थी,श्रीमती गांधी या कोई कांग्रेसी नेता तोप या टैंक लेकर सीमा पर नहीं गये थेे। आज सेना की सफलता का श्रेय देश की जनता वर्तमान नेतृत्व की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति को दे रही है तो कांग्रेस को लोकतंत्र की इस रीत को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए,न कि सत्ताधारी दल को छोटा साबित करने के लिए सेना के शौर्य पर ही सवालिया निशान लगाए जाएं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी है और अभी सैन्य अभियान भी जारी है। ऐसे में हमारी तरफ से दिखाई जाने वाली थोड़ी-सी भी नासमझी अलग-थलग पड़े दुश्मन देश पाकिस्तान के लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। समय देश,सेना व सरकार के साथ एकजुटता दिखाने का और वयं पंचाधिकम् शतम् के महावाक्य को व्यवहार में लाने का है,न कि क्षूद्र राजनीतिक हित साधने का।